सीरवी समाज - ब्लॉग

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Posted By : Manohar Seervi on 02 Jan 2020, 12:18:50
व्यक्ति अगर रिश्तेदार बनकर जियेगा तो रिश्ता तीर्थ स्थल बन जायेगा । परिवार रिश्तेदारों से बनता है।दावेदारों से नहीं ।यदि रिश्तों को तीर्थ नहीं बनाया तो कितनी भी तीर्थ यात्राएं कर लो कुछ फल प्राप्त होने वाला नही है। परिवार वह सुरक्षा कवच है जिसमें रह कर व्यक्ति शांति का अनुभव करता है। अगर आपके रिश्ते में पूरी तरह से विश्वास , ईमानदारी , और समझदारी है तो जीवन में आपको वचन, कसम, नियम और शर्तों की कभी जरूरत नहीं पड़ेगी ।रिश्ते में आपसी समझ होना आवश्यक है।अत: अपने रिश्तों में दावेदारी नहीं करें , रिश्तों को तीर्थ बनाने का प्रयास करें । व्यक्ति के जीवन में व्यक्तिगत समस्याएं कम होती है और संम्बंधो से उत्पन्न समस्याएं अधिक है। जब रिश्तों की मर्यादाएं टूट जाती है, तो बहुत कुछ समाप्त हो जाता है। रिश्ते आपसी सामंजस्य से बनते है।जहां वादा होता है वहां रिश्ता होता है और जहां दावा होता है वहां रिश्ता नहीं होता है। जब तक रिश्तों को निभाना नहीं सीखेंगे हम अपने जीवन में धर्म नहीं कर पायेंगे ।रिश्तों के रास्ते ही धर्म आता है। सौभाग्य आता है ।
एक जमाना था जब पर..
Posted By : Posted By seervi on 09 Dec 2019, 09:08:30
मंदिर में दर्शन का महत्त्व ओर प्रयोजन

हम लोग बढेरा या मंदिर में दर्शन करने जाते हैं,। दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पैड़ी पर या ओटले पर थोड़ी देर बैठते हैं। इस परंपरा का कारण क्या है ?
अभी तो लोग वहां बैठकर अपने घर की, व्यापार की, राजनीति की चर्चा करते हैं। परंतु यह परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है।

वास्तव में वहां मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के और एक श्लोक बोलना चाहिए ।यह श्लोक हम भूल गए हैं। इस श्लोक को सुने और याद करें ।और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बता कर जाएं ।
श्लोक इस प्रकार है

अनायासेन मरणम ,बिना दैन्येन जीवनम ।
देहान्ते तव सानिध्यम ,देहिमे परमेश्वरम।।

जब हम मंदिर में दर्शन करने जाएं तो खुली आंखों से आई माताजी का दर्शन करें । कुछ लोग वहां नेत्र बंद करके खड़े रहते हैं ।आंखें बंद क्यों करना ।हम तो दर्शन करने आए हैं ।आई माताजी के स्वरूप का ,श्री गादी पाट, का मुखारविंद का ,श्रंगार का संपूर्ण आनंद लें । आंखों में भर लें इस स्वरूप को । दर्शन करें और दर्शन करने के बाद जब बाहर आकर बैठें तब नेत्र बंद करके ,जो दर्शन किए हैं, उस स्वरूप क..
Posted By : Posted By seervi on 27 Nov 2019, 05:38:45
*एक हो युवाओं और समाज के उद्धेश्य*
युवा सीरवी समाज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है l एक तरफ शिक्षित व् प्रशिक्षित युवाओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है, वही दूसरी तरफ बेरोजगारी की दर भी बढती जा रही है, सम्पूर्ण भारत में बसे सीरवी समाज के युवाओं के साथ यह दशा और मनोदशा पाँव पसारती नजर आ रही है, सरकारी क्षेत्रो में नौकरियों की कमी, उद्योग धंधो की कमजोर होती माली हालत, टूटते परिवार, महंगे होते व्यापारिक उपक्रम, निजी नौकरियों की वेतन विसंगतिया, बदलते व्यापारिक हालात आदि बहुत से कारण है की आज सीरवी समाज का युवा बढती बेरोजगारी से निर्णय लेने की स्थिति से महरूम होता जा रहा है l जब से सूचना तकनीक क्रान्ति का उद्भव हुआ है, तब से आज समाज के हर युवा चाहे वह स्त्री हो चाहे पुरुष हो के हाथ में स्मार्ट फोन है, जिससे उसे देश दुनिया और अलग अलग प्रान्तों में बसे अपने जाती बंधुओ से परिचित कराने में मदद की है तथा विभिन्न तरीको से उस युवा के सपनों को नयी उड़ान दी है, एक ज़माना था जब युवा आदर्शवाद और रूमानी दुनिया से अपना सफ़र शुरू करते थे लेकिन आज का युवा बहुत जल्द खुद को परिपक्..
Posted By : Posted By seervi on 17 Nov 2019, 05:12:32
*सरकार द्वारा निष्प्रयोज्य घोषित हो जाने अर्थात रिटायर हो जाने के बाद तमाम सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के समक्ष समय काटना एक विकट समस्या बन जाती है।***

*इस स्थति का सामना करने के लिये लोगों ने तरह-तरह के उपाय और तरीक़ों को ईजाद किया है।

*कुछ कर्मठ ब्रान्ड के लोग तुरंत रामू काका के रोल में आ जाते हैं और सबेरे से उठ कर कंधे में तौलिया लटका कर घर की साफ़ सफ़ाई और किचेन के ज़रूरी कामों को निबटाने में जुट जाते हैं।

*बचे हुये दिन के समय में यह पत्नियों के लिये ड्राइवर की सेवायें मुहैया कराते हैं और बाज़ार में ख़रीदारी और सिनेमा आदि दिखाने का कार्य बख़ूबी निबटाते हैं।

*ऐसे लोगों की पत्नियों ने पूर्व जन्म में अवश्य कुछ अच्छे कार्य किये होंगे जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें यह सुखद स्थति प्राप्त हुई है।

*तमाम लोग ऐसे भी हैं जो रिटायर होने के बाद एकाएक अत्यधिक धार्मिक हो जाते हैं ओर सुबह शाम दो दो घंटे विभिन्न मंदिरों में पूजा पाठ और भजन कीर्तन में अपना टाइम बिता लेते हैं भले ही इसके पहले उन्होंने मंदिरों में कभी झांका भी न हो और भूल से भी कभी को..
Posted By : Posted By seervi on 15 Nov 2019, 04:27:53
WHAT IS THE MATURITY

आदि शंकराचार्य जी से प्रश्न किया गया कि "परिपक्वता" का क्या अर्थ है?

आदि शंकराचार्य जी ने उत्तर दिया –

1. परिपक्वता वह है - जब आप दूसरों को बदलने का प्रयास करना बंद कर दे, इसके बजाय स्वयं को बदलने पर ध्यान केन्द्रित करें.
2. परिपक्वता वह है – जब आप दूसरों को, जैसे हैं, वैसा ही स्वीकार करें.
3. परिपक्वता वह है – जब आप यह समझे कि प्रत्येक व्यक्ति उसकी सोच अनुसार सही हैं.
4. परिपक्वता वह है – जब आप "जाने दो" वाले सिद्धांत को सीख लें.
5. परिपक्वता वह है – जब आप रिश्तों से लेने की उम्मीदों को अलग कर दें और केवल देने की सोच रखे.
6. परिपक्वता वह है – जब आप यह समझ लें कि आप जो भी करते हैं, वह आपकी स्वयं की शांति के लिए है.
7. परिपक्वता वह है – जब आप संसार को यह सिद्ध करना बंद कर दें कि आप कितने अधिक बुद्धिमान है.
8. परिपक्वता वह है – जब आप दूसरों से उनकी स्वीकृति लेना बंद कर दे.
9. परिपक्वता वह है – जब आप दूसरों से अपनी तुलना करना बंद कर दें.
10. परिपक्वता वह है – जब आप स्वयं में शांत है.
11. परिपक्वता वह है – जब आप जरूरतों और चाहतों के बीच का अंतर करने में सक्षम हो जाए औ..
Posted By : Posted By seervi on 15 Nov 2019, 04:25:48
मेरी अभिलाषा सीरवी नवयुवक मंडल व परगना समिति जैतारण का 21वां प्रतिभा सम्मान समारोह पर

भाग्य चमकेगा एक बार फिर से सीरवी बंधुओं से मुलाकातें होंगी, मेरे ह्रदय के आँगन में रिमझिम बरसातें होंगी । कहने को तो बहुत कुछ है, क्या हम कह पायेंगे, जो रह गई अधुरी अभिलाषा, वो एक साथ पूरी होगी । 

प्रतिभा सम्मान समारोह का इंतजार, हम सभी कर रहे थे, अब तो हर एक लम्बे के सपने साकार, सच में पूरी होगी।  हो सकता है, मुझमें वो हुनर नहीं, कुछ विशेषकर पायें हम, इसके बावजूद हमारी प्रशंसा हो, इससे अच्छी और क्या बात होगी। 

अपने उत्तम सम्मान को, सम्मान दिलाता, यह सम्मान समारोह, हमारे आई पंथ के ह्रदय में, एक शांति प्रदान करती होगी। अब तेजी से अग्रसर होता ये " सीरवी समाज "सर्वश्रेष्ठ और सुनहरी होगी, बस एक सुर-ताल हो बंधु, रुकने-झुकने की कोई बात न होगी। 

इतिहास गवाह है, छात्र-छात्राओं का सम्मान जहाँ हो, वो समाज प्रगति में होगी, सावन सी अद्भुत घटा " जैतारण" में निरंतर छात्र-छात्राओं की सम्मान की बारिश होगी। अब निर्बल कहा किसी क्षेत्र में सीरवी समाज हर क्षेत्र में कार्यशील होगी, 21वां प..
Posted By : seervi on 07 Nov 2019, 04:38:01
प्रिय स्वजातीय बंधुओं,

जैसा कि हम सभी जानते है कि वर्तमान समय टेक्नाँलोजी का समय है जहाँ सभी लोग अपनी पर्सनल लाइफ में व्यस्त है| सभी के अपने अपने काम है| और सभी उन्हे पूरा करने में प्रयत्नशील है| इन सबके साथ साथ हमारे कुछ साथी भी है| जैसे मित्र गण, भाई-बंधु और परिवार के सदस्य इत्यादि | जो हमारी जिन्दगी के लिए बहुत जरूरी है| इनके साथ हम अपनी खुशियाँ बाँटते है| तथा ये सभी हमारे दुखः में भी साथ रहते है| इन सभी से हमारी लाइफ बहुत सरल और आनन्दमय हो जाती है| और इन सभी के बीच एक बंधन और होता है| जिसे समाज कहते है| समाज भी एक तरह का परिवार ही है| जो हमारे सुख और दुखः में हमारे साथ रहती है|

परन्तु आज के व्यस्ततम् समय में अब समाज का महत्व कम होता जा रहा है| जिसका प्रमुख कारण आज का ग्लोबलाइजेशन है| वर्तमान समय में लोगो का सीमाक्षेत्र व्यापक हो गया है| इस व्यापक क्षेत्र में समाज के लिए पर्याप्त समय निकालना आसान नही रह गया है|

समाज का महत्व कम होने का दूसरा प्रमुख कारण संयुक्त परिवारो का टूटना तथा एकल परिवारो का बढ़ना है| क्योकि संयुक्त परिवारो में घर के बुजुर्ग लोग सामा..
Posted By : Posted By seervi on 11 Oct 2019, 08:09:06
त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्वम् मम देवदेवं।।

सरल-सा अर्थ है, 'हे भगवान! तुम्हीं माता हो, तुम्हीं पिता, तुम्हीं बंधु, तुम्हीं सखा हो। तुम्हीं विद्या हो, तुम्हीं द्रव्य, तुम्हीं सब कुछ हो। मेरे देवता हो।'

बचपन से प्रायः सबने पढ़ी है। छोटी और सरल है इसलिए रटा दी गई है। बस त्वमेव माता भर बोल दो, सामने वाला तोते की तरह पूरा श्लोक सुना देता है।

मैंने 'अपने रटे हुए' कम से कम 50 मित्रों से पूछा होगा, 'द्रविणं' का क्या अर्थ है? संयोग देखिए एक भी न बता पाया। अच्छे खासे पढ़े-लिखे भी। एक ही शब्द 'द्रविणं' पर सोच में पड़ गए।

द्रविणं पर चकराते हैं और अर्थ जानकर चौंक पड़ते हैं। द्रविणं जिसका अर्थ है द्रव्य, धन-संपत्ति। द्रव्य जो तरल है, निरंतर प्रवाहमान। यानी वह जो कभी स्थिर नहीं रहता। आखिर 'लक्ष्मी' भी कहीं टिकती है क्या!

कितनी सुंदर प्रार्थना है और उतना ही प्रेरक उसका 'वरीयता क्रम'। ज़रा देखिए तो! समझिए तो!

सबसे पहले माता क्योंकि वह है तो फिर संसार में किसी की जरूरत ही नहीं। इसलिए हे प्रभु! ..
Posted By : Posted By seervi on 04 Oct 2019, 08:28:52
👏जय आईजी👏
🙏सादर वन्दे🙏
आज के परिपेक्ष मे अगर देखा जाये तो नाता प्रथा गलत नही है । हिन्दुस्तान के बहुत से समाजो मे पहले नाता प्रथा का प्रचलन नही था । उस समय नारी का सम्मान अवलौकिक ही था । नारी भोग्या नही समझी जाती थी ।अनायास ही विधवा होनेपर उम्रभर सांसारिक सुखो से वंचित रहना पडता था, सुहागिन का सौभाग्य नही मिलता था, ताने मारे जाते थे, शुभकार्यो पर सही स्थान नही मिलता था , और लज्जाहीन तत्वों से बचकर रहना पडता था, सही होकर भी कुदृष्टि का बोझ उन अबलाओं को झेलना पडता था इत्यादि इत्यादि ।

मगर आज की नारी शिक्षित हो रही है , अब अबला नही सबला बन रही है, महत्वपूर्ण कार्यो मे हाथ बंटा रही है अतः आज के आधुनिक युग मे स्त्री नाता प्रथा को मै सही मानता हूं ।

देश की बहुत सी जातियों मे हाटा-पाटा प्रथा है , कहीं पर मामा की बेटी से शादी की परम्परा है तो हमारी समाज मे होनेवाले दामाद की बहन, या उनके परिवार या रिशते की लडकी से शादी करने को ही हाटा-पाटा कहा जाता है ।

बडे बुजुर्गों ने जब यह परम्परा डाली होगी तब उनका मानस आपसी घनिष्ठता बढाना ही रहा..
Posted By : Posted By seervi on 30 Sep 2019, 03:52:26
......समाज में शिक्षित स्त्री- और पारम्परिक पारिवारिक मूल्यों पर प्रभाव ............

एक स्त्री ही तो हैं ,जो एक अंश का निर्माण करती है ,उसी अंश से एक परिवार का निर्माण होता हैं और परिवार से समाज का और समाज से ही एक राष्ट्र का निर्माण होता है ।
परंतु पुरुष प्रधान होने के कारण स्त्री का दर्जा समाज में पुरुष से नीचे रखा गया है अब समाज में स्त्री शिक्षित हो या अशिक्षित उसकी कोई तुलना नहीं करना चाहिए बल्कि समाज में स्त्री को समानता का अधिकार होना चाहिए ।
फिर भी विषय शिक्षित स्त्री का हे -
अब यदि समाज जनता हे की स्त्री से एक अंश का निर्माण होता है तो स्त्री को शिक्षित करना भी जरुरी होना चाहिए यदि स्त्री शिक्षित होगी तो ही शिक्षित परिवार ,समाज और शक्षित राष्ट्र का निर्माण होगा लेकिन कुछ अंधविश्वास के कारण स्त्री को झुकना ही पड़ता है अब सवाल उठता है कि कैसे स्त्री को अंधविश्वास के कारण झुकना पड़ता है ।
एक परिवार में दो जुड़वाँ बच्चे पैदा होते है तो एक लड़का है और एक लड़की , अब जुड़वाँ बच्चो की परवरिश एक जैसी होती है क्योंकि समाज इसे भगवान का आशीर्वाद मानते है ,लेकिन जैसे ज..
Posted By : Posted By seervi on 29 Sep 2019, 04:33:53
मेरे समाज में आज भी घूँघट निकालने के लिए बाध्य किया जाता है ना सिर्फ गाँव में बल्कि बड़े शहरों में भी आज की पढ़ी लिखी नए विचारो की लडकिय हाथ भर का घूँघट निकाल रही है, आखिर में गुलामी का भार कब तक उठाएगी ? हमारे समाज की पढ़ी लिखी लडकिया जो नए जमाने के साथ कदम मिला कर आगे बढ़ना चाहती है उन्हें ये रुढ़िवादी विचारधारा वापस उसी कीचड में घसीट रही है जब लडकिया ये सब बंदिशे भाव झेल नहीं पाती और घटती है तथा उनके माँ बाप उन्हें कुछ ऐसी महिलाओं का उदाहरण देकर हिम्मत बंधाते है चुप चाप जी रही है अफ़सोस की बात है की आज के लड़के जो खुद को हॉलीवुड की दुनिया के करीबी मानते है वो भी इसका विरोध नहीं करते, जो अच्छे से जानते है की घूँघट एक कुप्रथा (अनाचार) है और एक गुलामी की निशानी है, बदलाव के लिए बड़ी बड़ी बाते नहीं बड़ा जिगर होना चाहिए l लडकियों को खुद अपनी स्थिति बदलनी होगी बिना किसी रुकावट में उसके लिए किसी ना किसी को तो पहल करनी ही पड़ेगी l
इस पर समाज विचार करे

नैनाराम बर्फा (नेमीचंद बर्फा)
महेश्वरम, हेदराबाद, तेलंगाना
9739631455..
Posted By : Posted By seervi on 29 Sep 2019, 04:31:54
आलेख:-समाज में शिक्षित स्त्री औऱ पारम्परिक पारिवारिक मूल्यों पर प्रभाव:-
अपना देश विश्व में अपने सांस्कृतिक विरासत के उच्च आदर्श मूल्यों के लिए प्रसिद्ध है।इस देश के आदर्श मूल्य,परम्पराए औऱ सामाजिक प्रतिमान एक अनमोल धरोहर की तरह है।इस देश में मूल्य,परम्पराए औऱ सामाजिक प्रतिमान आनुवांशिक गुणों की तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते आए है। यह सही है कि समय के साथ उनमें कुछ परिवर्तन भी आए है।इस आलेख "समाज में शिक्षित स्त्री और पारम्परिक पारिवारिक मूल्यों पर प्रभाव" के मूल में जानने से पहले हमें स्त्री की शैक्षिक स्थिति औऱ पारम्परिक पारिवारिक मूल्यों को जानना जरूरीहै।
प्राचीन काल में शिक्षा का अभाव था।शिक्षा में भी नारी शिक्षा बहुत ही कम थी।वैदिक काल में नर-नारी को समान अधिकार थे औऱ उनके आदर्श भी थे।नारियों को पढ़ने की आजादी थी औऱ वे शास्त्रार्थ में भी भाग लेती है।मैत्रयी औऱ गार्गी इनके उदाहरण है। वैदिक काल के उत्तरार्द्ध औऱ मध्यकाल में नारी शिक्षा पर ग्रहण लग गया औऱ नारी को तत्कालीन परिस्थितियों के कारण घर की चार दीवारी में कैद ..
Posted By : Posted By seervi on 25 Sep 2019, 12:54:26
समाज में शिक्षित स्त्री ओर पारंपरिक मूल्यों पर प्रभाव 💫 विचार मेरे विचारों में 💫
नारी का शिक्षित होना न केवल एक परिवार के लिए बल्कि हमारे समाज व हमारे राष्ट्र के लिए भी परमावश्यक है | परिवार में यदि स्त्री पड़ी लिखी है तो वह परिवार का उचित मार्ग दर्शन कर सकती है | परिवार को आगे बढ़ाने में अपनी शिक्षा के बल पर वह परिवार की आर्थिक रूप से मदत कर सकती है | सामाजिक कार्यों में अपना सहयोग दे सकती है | समाज के विकास में अपना पूर्ण सहयोग प्रदान कर सामाजिक विकास को गति प्रदान कर सकती है | वर्तमान समय में एसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ नारी अपनी भूमिका न निभाती हो | शिक्षा, साहित्य, व्यवसाय, खेल, राजनीति हर क्षेत्र में नारी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हुई एक मिसाल कायम कर रही है |
🌸 शिक्षित नारी सबपे भारी
हमेशा निभाती अपनी जिम्मेदारी
कभी ना दिखाती कोई लाचारी
शिक्षित नारी कभी ना हारी 🌸
स्त्री यदि पड़ी लिखी है तो वह स्वयं तो आत्म निर्भर बनती है साथ ही उसके दोनों परिवार भी आत्मनिर्भर बनते है प्राचीन कल से लेकर वर्तमान समय तक नारी की महत्ता को ठुकराया नहीं जा सकता | प..
Posted By : Posted By seervi on 22 Sep 2019, 04:33:51
युवा किसी भी समाज के कर्णधार हैं, वे उसके भावी निर्माता हैं। चाहे वह नेता या शासक के रूप में हों , चाहे डॉक्टर, इन्जीनियर, वैज्ञानिक, साहित्यकार व कलाकार के रूप में हों। इन सभी रूपों में उनके ऊपर अपनी सभ्यता, संस्कृति, कला एवम् ज्ञान की परम्पराओं को मानवीय संवेदनाओं के साथ आगे ले जाने का गहरा दायित्व होता है। पर इसके विपरीत अगर वही युवा वर्ग उन परम्परागत विरासतों का वाहक बनने से इनकार कर दे तो निश्चिततः किसी भी राष्ट्र का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

युवा शब्द अपने आप में ही उर्जा और आन्दोलन का प्रतीक है। युवा को किसी राष्ट्र की नीव तो नहीं कहा जा सकता पर यह वह दीवार अवश्य है जिस पर राष्ट्र की भावी छतों को सम्हालने का दायित्व है। जब तक यह ऊर्जा और आन्दोलन सकारात्मक रूप में है तब तक तो ठीक है, पर ज्यों ही इसका नकारात्मक रूप में इस्तेमाल होने लगता है वह विध्वंसात्मक बन जाती है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर किन कारणों से युवा उर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है? वस्तुतः इसके पीछे जहाँ एक ओर अपनी संस्कृति और जीवन मूल्यों से दूर हटना है, ..
Posted By : Posted By seervi on 19 Sep 2019, 12:25:17
प्रिय स्वजनो
सादर वन्दे ।
सीरवी समाज मे नारी शिक्षा प्रगति पथ पर है , हर मां बाप अपनी बेटी को पढाना चाहता है, पढाता है ।

नारी शिक्षा के बारे मे सत्य कहा गया है कि एक बालिका के पढऩे से सात पीढियों को फायदा होता है । जब लडकी पढती है तो पुरा परिवार उसको सम्मान देता है , घर परिवार मोहल्ले मे उसका मान होता है , जितनी गहनता से बेटियां शिक्षा ग्रहण करने मे मन लगाती है उतना बेटे नही लगाते ।😢

समाज मे बेटियों का शैक्षणिक स्तर सुधरा है मगर माध्यमिक विद्यालयों से आगे मार्ग अवरूद्ध हो जाता है , मसलन अन्य गांव या बडे शहरों के कॉलेजों मे जाना, सगाई सगपण की तैयारियां , जवानी की दहलीज पर बढते कदम ।
उच्छ शिक्षा मे फिलहाल सीरवी समाज जितना प्रगतिशील होना चाहिए था उसके अनुपात मे बहुत कम है ,, इसके बहुत ही कारण है जैसै कम उम्र मे सगाई , अदलाबदली के सगपण , भाई-भतीज या अन्य के बदले मे उसकी सगाई , कॉलेजों मे अध्ययन हेतु अन्यो शहरो मे जाना,, कुच्छ नाममात्र लडकियों के पैर फिसलना और इसी तरह के बहुत से कारण है जो बेटियों को उच्च व उच्चतम शिक्षा मे रोडा बनते है ।
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