सीरवी समाज - ब्लॉग

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Posted By : Posted By seervi on 03 Aug 2019, 06:32:37
गायत्री निवास
बच्चों को स्कूल बस में बैठाकर वापस आ शालू खिन्न मन से टैरेस पर जाकर बैठ गई.

सुहावना मौसम, हल्के बादल और पक्षियों का मधुर गान कुछ भी उसके मन को वह सुकून नहीं दे पा रहे थे, जो वो अपने पिछले शहर के घर में छोड़ आई थी.

शालू की इधर-उधर दौड़ती सरसरी नज़रें थोड़ी दूर एक पेड़ की ओट में खड़ी बुढ़िया पर ठहर गईं.

‘ओह! फिर वही बुढ़िया, क्यों इस तरह से उसके घर की ओर ताकती है?’

शालू की उदासी बेचैनी में तब्दील हो गई, मन में शंकाएं पनपने लगीं. इससे पहले भी शालू उस बुढ़िया को तीन-चार बार नोटिस कर चुकी थी.
दो महीने हो गए थे शालू को पूना से गुड़गांव शिफ्ट हुए, मगर अभी तक एडजस्ट नहीं हो पाई थी.

पति सुधीर का बड़े ही शॉर्ट नोटिस पर तबादला हुआ था, वो तो आते ही अपने काम और ऑफ़िशियल टूर में व्यस्त हो गए. छोटी शैली का तो पहली क्लास में आराम से एडमिशन हो गया, मगर सोनू को बड़ी मुश्किल से पांचवीं क्लास के मिड सेशन में एडमिशन मिला. वो दोनों भी धीरे-धीरे रूटीन में आ रहे थे, लेकिन शालू, उसकी स्थिति तो जड़ से उखाड़कर दूसरी ज़मीन पर रोपे गए पेड़ जैसी हो गई थी, जो अभी भी नई ज़मीन नहीं पकड़ पा रहा थ..
Posted By : Posted By seervi on 03 Aug 2019, 05:22:22
रात मैं पत्नी के साथ होटल में रुका था। सुबह दस बजे मैं नाश्ता करने गया। क्योंकि नाश्ता का समय साढ़े दस बजे तक ही होता है, इसलिए होटल वालों ने बताया कि जिसे जो कुछ लेना है, वो साढ़े दस बजे तक ले ले। इसके बाद बुफे बंद कर दिया जाएगा।
कोई भी आदमी नाश्ता में क्या और कितना खा सकता है? पर क्योंकि नाश्ताबंदी का फरमान आ चुका था इसलिए मैंने देखा कि लोग फटाफट अपनी कुर्सी से उठे और कोई पूरी प्लेट फल भर कर ला रहा है, कोई चार ऑमलेट का ऑर्डर कर रहा है। कोई इडली, डोसा उठा लाया तो एक आदमी दो-तीन गिलास जूस के उठा लाया। कोई बहुत से टोस्ट प्लेट में भर लाया और साथ में शहद, मक्खन और सरसो की सॉस भी।
मैं चुपचाप अपनी जगह पर बैठ कर ये सब देखता रहा ।
एक-दो मांएं अपने बच्चों के मुंह में खाना ठूंस रही थीं। कह रही थीं कि फटाफट खा लो, अब ये रेस्त्रां बंद हो जाएगा।
जो लोग होटल में ठहरते हैं, आमतौर पर उनके लिए नाश्ता मुफ्त होता है। मतलब होटल के किराए में सुबह का नाश्ता शामिल होता है। मैंने बहुत बार बहुत से लोगों को देखा है कि वो कोशिश करते हैं कि सुबह देर से नाश्ता करने पहुंचें और थोड़ा अधिक खा ल..
Posted By : Posted By on 02 Aug 2019, 03:38:02
सीरवी कौम को पीछे धकेलने में सीरवी का योगदान:

आज की चर्चा का विषय यही है,हो सकता है कई बुद्दिजीवी महानुभावो को अटपटा और कुछ को बुरा लगे परन्तु आज इस विषय पर थोडा गौर कर लिया जाए. आज अपने सीरवी समाज के बढेर व उससे जुड़े संगठन,मंडली और पता नही क्या क्या सभाएं बन चुकी / बन रहेे हैं ।
लगभग सभी इतने हाईटेक हैं कि बिरादरी का सारा उत्थान कीबोर्ड के द्वारा सोशल प्लेटफार्म पर ही कर दे रहे हैं.
किधर भी निकल जाओ किसी न किसी सीरवी संगठन के पदाधिकारी से आप टकरा जाओगे. कोई मंत्री कोई सचिव कोई अध्यक्ष कोई उपाध्यक्ष तरह तरह के पदाधिकारी मगर कार्यकता कोई नहीं.. अगर है भी तो कार्य मगर कर्ता सिर्फ नाम के, जीमण जीमाने , स्वागत करवाने ,जयकारे लगवाने ।
आजकल काबिल नहीं होने के बावजूद भी कोई भी पदाधिकारी बन सकता बशर्ते काबिलियत से ज्यादा आर्थिक रूप से मजबूत हो, और जब आर्थिक रूप से मजबूत हो तो समर्थक तो पहले से तैयार (चापलूसी किश्म के लोग) फिर एक स्मार्ट फ़ोन हो जिसके थ्रू ज्यादा कुछ नहीं करना बस फोटो खीचकर सोशल प्लेटफार्म पर चिपका दो, I am with फलाना साहब , selfi with ढिमका जी |
असल में जो ह..
Posted By : Posted By seervi on 02 Aug 2019, 03:19:20
किरलियान फोटोग्राफी ने मनुष्‍य के सामने कुछ वैज्ञानिक तथ्‍य उजागर किये हैं। किरलियान ने मरते हुए आदमी के फोटो लिए, उसके शरीर से ऊर्जा के छल्‍ले बाहर लगातार विसर्जित हो रहे थे, और वो मरने के तीन दिन बाद तक भी होते रहे। मरने के तीन दिन बाद जिसे हिन्‍दू तीसरा मनाता है।

अब तो वह जलाने के बाद औपचारिक तौर पर उसकी हड्डियाँ उठाना ही तीसरा हो गया। यानि अभी जिसे हम मरा समझते हैं वो मरा नहीं है। आज नहीं कल वैज्ञानिक कहते हैं तीन दिन बाद भी मनुष्‍य को जीवित कर सकेगें।

और एक मजेदार घटना किरलियान के फोटो में देखने को मिली। की जब आप क्रोध की अवस्‍था में होते हो तो तब वह ऊर्जा के छल्‍ले आपके शरीर से निकल रहे होते हैं। यानि क्रोध भी एक छोटी मृत्‍यु तुल्‍य है।

एक बात और किरलियान ने अपनी फोटो से सिद्ध की कि मरने से ठीक छह महीने पहले ऊर्जा के छल्‍ले मनुष्‍य के शरीर से निकलने लग जाते हैं। यानि मरने की प्रक्रिया छ: माह पहले शुरू हो जाती है, जैसे मनुष्‍य का शरीर मां के पेट में नौ महीने विकसित होने में लेता है वैसे ही उसे मिटने के लिए छ: माह का समय चाहिए। फिर तो दुर्घटना ज..
Posted By : Posted By seervi on 01 Aug 2019, 04:22:33
आप स्वयं अपने भाग्य की निर्माता हो।
किसी ने कहा है कि ,
\"इरादा पक्का हो बंदे तो मंजिल तेरी दूर नही।
वह तुझसे दूर नही और तू उससे दूर नही।।\"
यह सच है कि हम जीवन में ठान ले तो असंभव को भी संभव कर जाते है।बस जरूरत इस बात की रहती है कि जीवन मे हम नेक इरादों से आगे बढ़े और अपनी कमियों के विश्लेषण कर उसमें सुधार करे।विद्यार्थी जीवन सम्पूर्ण जीवन काल का श्रेयष्कर समय होता है।यह जीवन निर्माण की आधारशिला भी होती है।यदि हर विद्यार्थी अपने इस समय का प्रयोग सही एवं सटीक तथा लयबद्ध कर ले तो सफलता मिलना आसान हो जाता है।
प्रत्येक विद्यार्थी चाहे वह बालक हो या बालिका अपने जीवन को संवारना चाहते है या सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए अपने आपको देखना चाहते है।
अपने जीवन में कुछ आदर्श बनाये और उन आदर्शो को अपने जीवन का अहम हिस्सा मानते हुए जीवन जिये।
मैं इस आलेख में कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदुओं का जिक्र कर रहा हूँ जिन्हें आप आत्मचिंतन-मंथन करे और अपने जीवन मे बड़ी ईमानदारी से अपनाये तो सफलता निश्चित रूप से आपके साथ होगी।
1.विचारों में शुद्धता :-
विचार व्यक्ति के व्यक्तित..
Posted By : Posted By seervi on 01 Aug 2019, 03:48:00
एक मेजर के नेतृत्व में 15 जवानों की एक टुकड़ी हिमालय के अपने रास्ते पर थी
बेतहाशा ठण्ड में मेजर ने सोचा की अगर उन्हें यहाँ एक कप चाय मिल जाती तो आगे बढ़ने की ताकत आ जाती

लेकिन रात का समय था आपस कोई बस्ती भी नहीं थी
लगभग एक घंटे की चढ़ाई के पश्चात् उन्हें एक जर्जर चाय की दुकान दिखाई दी
लेकिन अफ़सोस उस पर ताला लगा था.
भूख और थकान की तीव्रता के चलते जवानों के आग्रह पर मेजर साहब दुकान का ताला तुड़वाने को राज़ी हो गया खैर ताला तोडा गया
तो अंदर उन्हें चाय बनाने का सभी सामान मिल गया
जवानों ने चाय बनाई साथ वहां रखे बिस्किट आदि खाकर खुद को राहत दी थकान से उबरने के पश्चात् सभी आगे बढ़ने की तैयारी करने लगे लेकिन मेजर साहब को यूँ चोरो की तरह दुकान का ताला तोड़ने के कारण आत्मग्लानि हो रही थी

उन्होंने अपने पर्स में से एक हज़ार का नोट निकाला और चीनी के डब्बे के नीचे दबाकर रख दिया तथा दुकान का शटर ठीक से बंद करवाकर आगे बढ़ गए.

तीन महीने की समाप्ति पर इस टुकड़ी के सभी 15 जवान सकुशल अपने मेजर के नेतृत्व में उसी रास्ते से वापिस आ रहे थे

रास्ते में उसी चाय की दुकान को खुला ..
Posted By : Posted By seervi on 31 Jul 2019, 06:12:32
जब पति-पत्नी मानसिक रूप से एक दूसरे से घृणा करने लगे, तो वे एक छत के नीचे कब तक और कैसे रह सकते हैं? तलाक बुरा नहीं है, उसकी प्रकिया बुरी है, उसके आगे पीछे का समय असहनीय होता है। फिर लंबी प्रकिया के बाद दोनों परिवार टूट जाते हैं, एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में। इस कहानी के माध्यम से तलाक की प्रकिया को आसान बनाने की प्रयास किया गया है। किसी ने ठीक ही कहा है –

“खुशी बाँटने के लिए हजारों लोग आपको मिल जाएंगे, लेकिन दुःख में आप के साथ आसूँ बहाने वाले शायद ही मिल पायें।”

दोस्तों प्रतिदिन हम आप ज्योहीं अखबार के पन्ने पलटते हैं पाते हैं अखबार का दो से तीन पेज घरेलू हिंसा के खबरों से पटा रहता है, कहीं पति ने पत्नी का क़त्ल किया, कहीं पत्नी ने पति का। कहीं दोनों परिवार एक दूसरे पर केस डाल दिया, तो कहीं पत्नीं अपने बच्चों समेत ट्रेन से कट गई। ज्यादातर मामले पति पत्नी के संबंधों से जुड़ा रहता है, चाहे कारण दहेज हो या अन्य। टीवी न्यूज चैनल भी इसी तरह की ख़बरें दिखाते रहते हैं। आप समझ लीजिए ये घटनाएं अचानक नहीं होती, इसकी पृष्ठभूमि कई महीने या साल पहले लिखी गयी हो..
Posted By : Posted By seervi on 31 Jul 2019, 05:50:21
नयी पीढ़ी में रिश्तों के मायने और संस्कार !
रिश्तों की अपनी अहमियत होती है और जरूरी है कि हम उस रिश्ते की मर्यादा को समझे और अपने आने वाली पीढ़ी (माँ बाप अपने बच्चो के लिए )को भी समझाएं। ईट-पत्थरों की दीवारों में जब रिश्तों का एहसास पनपता है तभी वह घर कहलाता है।
आज की high profile और भागदौड भरी जिंदगी में हम रिश्तों की अहमियत को भूलते जा रहे हैं। हमारी busy लाइफ हमे रिश्तों से दूर कर रही है। इसका उसर बच्चो पर भी पडता है। तभी तो आज के बच्चे रिश्तों की अहमियत को बहुत कम समझते है।
जब बच्चा पैदा होता है तो उसके जन्म से ही उसके साथ कई रिश्ते जुड जाते हैं। लेकिन इन रिश्तों में से कितने ऎसे होते हैं जिन्हें वे निभा पातें हैं।
ऎसा इसलिए नहीं कि बच्चों को उन रिश्तों की अहमियत का नहीं पता बल्कि इसलिए कि क्योंकि माँ बाप खुद उन रिश्तों से दूर हैं।
बच्चों में संस्कार की नींव माता-पिता द्वारा ही रखी जाती है। अगर माता-पिता ही रिश्तों को तवज्जो नही देते तो बच्चे तो इन से अनजान रहेंगे ही।

आज समाज संयुक्त परिवार का प्रचलन घटता जा रहा है

संयुक्त परिवार में बच्चा दादा-दाद..
Posted By : Posted By seervi on 30 Jul 2019, 05:02:28
ये कैसा इश्क

ट्रैन के ए.सी. कम्पार्टमेंट में मेरे सामने की सीट पर बैठी लड़की ने मुझसे पूछा" हैलो, क्या आपके पास इस मोबाइल की पिन है??"

उसने अपने बैग से एक फोन निकाला था, और नया सिम कार्ड उसमें डालना चाहती थी। लेकिन सिम स्लॉट खोलने के लिए पिन की जरूरत पड़ती है जो उसके पास नहीं थी। मैंने हाँ में गर्दन हिलाई और सीट के नीचे से अपना बैग निकालकर उसके टूल बॉक्स से पिन ढूंढकर लड़की को दे दी। लड़की ने थैंक्स कहते हुए पिन ले ली और सिम डालकर पिन मुझे वापिस कर दी।

थोड़ी देर बाद वो फिर से इधर उधर ताकने लगी, मुझसे रहा नहीं गया.. मैंने पूछ लिया"कोई परेशानी??"

वो बोली सिम स्टार्ट नहीं हो रही है, मैंने मोबाइल मांगा, उसने दिया। मैंने उसे कहा कि सिम अभी एक्टिवेट नहीं हुई है, थोड़ी देर में हो जाएगी। और एक्टिव होने के बाद आईडी वेरिफिकेशन होगा उसके बाद आप इसे इस्तेमाल कर सकेंगी।

लड़की ने पूछा, आईडी वेरिफिकेशन क्यों??

मैंने कहा" आजकल सिम वेरिफिकेशन के बाद एक्टिव होती है, जिस नाम से ये सिम उठाई गई है उसका ब्यौरा पूछा जाएगा बता देना"

लड़की बुदबुदाई "ओह्ह"

मैंने दिलासा देते ..
Posted By : Posted By seervi on 29 Jul 2019, 03:35:56
।।मेरा समाज ,मेरा गौरव।।
सीरवी समाज की उत्पत्ति जिस मूल शब्द "सीर" से हुई है।वह अपने आपमे सब बया कर जाता है कि समाज के लोगों के दिलों में कैसी भावनाए है?समाज की सोच कैसी है?सीरवी समाज अपने प्रारम्भिक काल से जिस विराट सहृदयता को लेकर आगे बढ़ा, आज भी वे भावनाएं हमे दिखाई देती है।एक दूसरे का सहयोग करना औऱ ईमानदारी से साथ देना,किसी के साथ धोखा न करना यह अपने आपमे बड़ी बातें है।यही सीरवी समाज जिसे अधिकांश लोग चौधरी भी कहते है।अन्य जातियां सब हमारे समाज के बारे में किसी मौके या आपस के मेल-मिलाप में कहते है कि,"चौधरी समुन्दर बाकी सब नाडा"इसका भाव यह है कि सीरवियों का दिल बड़ा है,यहां हर कोई खट सकता है।जिस प्रकार समुन्दर अपनी विशाल सहृदयता के लिए जाना जाता है,उसमें गहराई होती है।वैसी ही विशाल सहृदयता औऱ गहराई सीरवियों में देखने को मिलती है।
हम तो कहते है कि,
"जिस समाज मे जन्मे है हम,वह हमारे लिए बड़ा है।
अहो,देखो समाजहित करने के लिए कितना कर्मक्षेत्र पड़ा है।"
हम सभी सीरवी समाज की उन तमाम अच्छाइयों पर नजर दौड़ाए जिनके बारे में आप चिंतन करे तो मन को बड़ा सुकून मिलता ह..
Posted By : Posted By seervi on 27 Jul 2019, 08:06:57
"तमसो मा ज्योतिर्गमय"

अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाओ, यह प्रार्थना भारतीय संस्कृति का मूल स्तंभ है - प्रकाश में व्यक्ति को सब कुछ दिखाई देता है अंधकार में नहीं l
यहां प्रकाश का तात्पर्य ज्ञान से है, और ज्ञान से व्यक्ति का अंधकार नष्ट होता है, उसका वर्तमान और भावी भविष्य का जीवन जीने योग्य बनाता है l
इसी को आधार मानते हुए बिलाड़ा में "रानी देवेंद्र कुमारी पब्लिक स्कूल" की स्थापना इस्वी संवत 2000 में बिलाड़ा में स्थित श्री आईमाताजी के पवित्र मंदिर प्रांगन के पास स्थित माननीय श्री दीवान माधव सिंह के आवास परिसर में स्थित है, विशालकाय निर्माण से आछंडित इस परिसर में शिक्षा के आयामों को केंद्र में रखते हुए स्वयं श्रीमुख श्री दीवान माधव सिंह एवं उनकी छोटी बहिन (श्रीमती मोहन कंवर जाडेजा) द्वारा इस्वी संवत 2000 में बाड़ी महल (नजर बाग़) में स्थापित किया गया l जो कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के नियमानुसार मान्यता प्राप्त है l
पूर्व दीवान स्व. श्री हरी सिंह जी को शिक्षा के महत्व की जानकारी देश की आजादी से भी बहुत पहले से थी, उनके अनुसार आने वाला भव..
Posted By : Posted By seervi on 26 Jul 2019, 05:39:54
#कलम की ताकत औऱ परिवर्तन#
आज मुझे एक पोस्ट से ऐसा लिखने को विवश किया कि," उठा,अपना मोबाइल औऱ मन के विचारों तथा भीतर से गा ले गीत सच्चाई का।"
कहते है कि,
"जिस दिन फूटेगा भीतर से,गीत सच्चाई का।
बन जायेगा कीर्तिमान,नव मानव की ऊँचाई का।

आत्म दीप की एक किरण ने,जब-जब तम को ललकारा।
प्रकट हो गया सत्य धरा पर,वही ज्ञान की गंगा धारा।।"
सच्चाई का गीत जब भीतर से प्रस्फुटित होता है तो वह न जाने कितने लोगों के मन को तरंगित कर जाता है। विचार मन को सही राह दिखाता है। सच्चे और अच्छे विचारों से जीवन की दशा औऱ दिशा दोनों बदल जाती है।विश्व की जितनी क्रांतियां हुई है ,उसके पर्दे के पीछे देखेंगे तो उस देश के साहित्यकारों की कलम की ताकत है।कलम की ताकत तलवार की ताकत से बलशाली होती है।विश्व में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार एक कलम की ताकत से ही हुआ है।जैन धर्म का जो सबसे सुंदर स्वरूप देख रहे हो ,वह उनके समृद्ध साहित्य के ही कारण है।उनके जितने तीर्थंकर या धर्म प्रवर्तक संत हुए है उन्होंने अपने साहित्य से धर्म को नई दिशा प्रदान की है।
सीरवी समाज का भी अपना एक पंथ है जिसे हम श्री आ..
Posted By : Posted By on 24 Jul 2019, 12:36:25
सीरवी समाज विकास सेवा समिति द्वारा जारी सामाजिक सुधारों के दिशा निर्देशों के प्रति मेरे निजी विचार

सीरवी समाज विकास समिति बिलाड़ा के द्वारा पिछले पचास सालों से चल रहे समाज सुधार के परिपेक्ष में वर्तमान समय की मांग को देखते हुए चाहे गये बिन्दुओं पर सहमत / असहमत का बिन्दु वार उत्तर एक नजर में

1. सहमत - सोब 50/-
2. सहमत - ओरना 100/-
3. सहमत - वेष 200/-
4. सहमत , डीजे बन्द हो
5. असहमत - कोण की बैठकों में भोजन पूरा बन्द होना चाहिये।
कोण की बैठकों में मुश्किल से 10 या 20 मिनट का समय ही लगता हैं ज्यादा समय पेट पूजा में लगता हैं।

अतिविशेष परिस्थितियों में 50 किलोमीटर से ज्यादा दूरी से आने वाले विशेष मेहमान जिनका 4 घंटे से अधिक समय तक रूकना आवश्यक हैं
दोपहर के भोजन की व्यवस्था की जा सकती हैं। अन्यथा बिल्कुल नहीं हो।
6. असहमत - भाईपा के सदस्य जिनका दिनभर रूकना आवश्यक है उनके लिए सिर्फ दोपहर के भोजन की व्यवस्था की जा सकती हैं।
7. सहमत - पीहर व ससुराल पक्ष का ही ओरना हो
8. सहमत - काँचली की जगह सिर्फ 10/- रुपये।
9. सहमत - बहन या सहासणी को केवल ओरना औडाना, वेष नहीं हो।
..
Posted By : Posted By seervi on 23 Jul 2019, 04:25:30
#"सामाजिक एकता औऱ समरसता" तथा सीरवी समाज#
सीरवी समाज का अपना गौरवपूर्ण इतिहास रहा है।सीरवी समाज के लोगों ने अपने सामाजिक प्रतिमानों,उच्च आदर्श मूल्यों औऱ सच्चे व्यवहारवादी आचरण से हर कौम के लोगों का दिल जीता है।यह हम अपने व्यक्तिगत अनुभव औऱ अपने बड़े बुजुर्गों के कथनों से तथा औरों से श्रीमुख से सुनकर कह रहे है।इन तथ्यों में सत्यता औऱ यथार्थता है।प्राचीन काल में धनी लोगो को अपने यहाँ नौकरी या काम पर रखना होता तो सबसे ज्यादा प्राथमिकता सीरवी समाज के लोगों को ही देते थे।आर्थिक रूप से लेन-देन करना होता तो भी लोग बेझिझक व्यवहार करते थे।सीरवी समाज के लोगों को सदा ईमानदार,मेहनतकश औऱ सरल स्वभाव के रूप में जाना करते थे। उन्ही आदर्श मूल्यों औऱ सामाजिक प्रतिमानों पर चलकर हमने महाजनों से व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त की औऱ आज भारत के लगभग हर शहर में सीरवी समाज के लोगों ने उन्ही आदर्श प्रतिमानों औऱ मूल्यों से प्रगति का मुकाम हासिल किया है। यह सब हमारे पुरखो की महान विरासत का सुखद परिणाम है।आज सीरवी समाज तीव्र गति से आर्थिक उन्नति कर रहा है।
हमारे पुरखों के म..
Posted By : Posted By seervi on 22 Jul 2019, 04:41:48
दुनिया के भ्रष्टाचार मुक्त देशों में शीर्ष पर गिने जाने वाले न्यूजीलैंण्ड के एक लेखक ब्रायन ने भारत में व्यापक रूप से फैंलें भष्टाचार पर एक लेख लिखा है। ये लेख सोशल मीडि़या पर काफी वायरल हो रहा है। लेख की लोकप्रियता और प्रभाव को देखते हुए विनोद कुमार जी ने इसे हिन्दी भाषीय पाठ़कों के लिए अनुवादित किया है। –

न्यूजीलैंड से एक बेहद तल्ख आर्टिकिल।

भारतीय लोग होब्स विचारधारा वाले है (सिर्फ अनियंत्रित असभ्य स्वार्थ की संस्कृति वाले)

भारत मे भ्रष्टाचार का एक कल्चरल पहलू है। भारतीय भ्रष्टाचार मे बिलकुल असहज नही होते, भ्रष्टाचार यहाँ बेहद व्यापक है। भारतीय भ्रष्ट व्यक्ति का विरोध करने के बजाय उसे सहन करते है। कोई भी नस्ल इतनी जन्मजात भ्रष्ट नही होती

ये जानने के लिये कि भारतीय इतने भ्रष्ट क्यो होते हैं उनके जीवनपद्धति और परम्पराये देखिये।

भारत मे धर्म लेनेदेन वाले व्यवसाय जैसा है। भारतीय लोग भगवान को भी पैसा देते हैं इस उम्मीद मे कि वो बदले मे दूसरे के तुलना मे इन्हे वरीयता देकर फल देंगे। ये तर्क इस बात को दिमाग मे बिठाते हैं कि अयोग्..
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