सीरवी समाज - http://www.seervisamaj.com - ब्लॉग

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Posted By : Manohar Seervi Posted By on 04 Jun 2020, 11:51:12
क्या जीवन में जरुरी है गंभीरता ?
कुछ लोग जीवन में हमेशा गंभीर रहते हैं ।चाहे उन्हें ढेरो सफलताएं मिल जाएं पर उनके चेहरे पर थोड़ी सी भी मुस्कान नहीं आती ।ऐसे लोग सोचते हैं कि अगर वे गंभीर नहीं रहेॆंगे तो लोग उन्हें हल्के में लेंगे। मानवीय स्वभाव के अनुसार वे भी हंसना चाहते हैं पर ऊंचा ओहदा व झूठी शान उन्हें ऐसा करने से रोकती है ।
दुनिया में आप कितनी भी भागदौड़ करले पर अंत में आपको लगता है कि सारी जमा पूंजी व्यर्थ है , सबसे जरुरी तो सबके साथ मिल बैठ कर हंसना गुनगुनाना और दूसरों का दर्द बांटना हैं । कुछ लोग जीवन को गंभीरता के साथ गुजार देते हैं और आखिर में उन्हें महसूस होता हैं कि वे कुछ खास नहीं कर पाए।।जीवन में या तो सफलता हासिल की जा सकती है या सार्थकता और जो व्यक्ति सफल होने के साथ साथ सार्थकभी बन जाता है ,वह महान बन जाता है। सफलता सिर्फ आपको खुश कर सकती है परसार्थकता से आप दूसरों का जीवन भी बदलते है।सार्थक बनने के लिए जीवन में जबरन घुसी हुई गंभीरता को कम करना होगा । हंसते हंसते दूसरों को भी हंसाना होगा । हर परेशानी में मुस्कराने वाला व्यक्ति मन से ग..
Posted By : Manohar Seervi Posted By on 10 May 2020, 11:17:09
सीरवी समाजबंधू आर्थिक रूप से अन्य कई समाजों के मुकाबले संपन्न है अर्थात धनि है, धनवान है, ज्ञानी है, दानी है, बुद्धिमान है, चारित्रसम्पन्न है, सुस्वभावी है, शिक्षित (एज्युकेटेड) है, मिलनसार है, ईमानदार है, व्यापार में होशियार है, मेहनती है फिर भी समाज दिन-ब-दिन पिछड़ता जा रहा है, अपनी पहचान को, अपने गौरव को खोता जा रहा है... क्यों??? क्योंकि एकता का आभाव है । समाज में एकता की कमी है । एकता से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है । एकता ही समाजोत्थान का आधार है। जो समाज संगठित होगा, एकता के सूत्र में बंधा होगा उसकी प्रगति को कोई रोक नहीं सकता किन्तु जहाँ एकता नहीं है वह समाज ना प्रगति कर सकता है, ना समृद्धि पा सकता है और ना अपने सम्मान को, अपने गौरव को कायम रख सकता है। सीरवी समाज इसका जीता-जागता उदहारण है । हम समाजबंधु एकसाथ रहते तो है लेकिन क्या हम उन्नत्ति-प्रगति के लिए एक-दूजे का साथ देते है? नहीं ; तो सिर्फ एकसाथ रहने का कोई मतलब नहीं । एकसाथ इस शब्द को कोई अर्थ तभी है जब हम एकसाथ रहे भी और एक-दूजे का साथ दे भी । ऐसी एकता को ही सही मायने में 'एकता' (Unity) कहा जाता है ।

समाज में एकता को क..
Posted By : Raju Seervi Posted By on 08 Mar 2020, 12:20:50
समाज को गतिशील, विकासोन्मुख एवं प्रतिशील बनाने के लिए संगठित होना एक आवश्यकता हैं। संगठन विहीन समाज बिना पतवार के नाव जैसी होती है , जिसकी कोई दिशा नहीं होती और न ही कोई उद्देश्य। विश्व के समस्त समाज शास्त्रियों ने समाज और संगठन के बारे में सदैव यही बताया है, कि संगठन समाज का प्राण है।  इसी परिप्रेक्ष्य में आगे बढ़ते हुए सीरवीयों के कल्याण हेतु सीरवी समाज को संगठित करने, एकजुट करने का कार्य पिछले कई वर्षों से किया जा रहा है। विभिन्न स्तरों पर संगठन का निर्माण किया गया है और संगठन को गति प्रदान करने के लिए समर्पित, सेवा भाव से युक्त कार्यकर्ताओं की सेवायें ली जाती है। अखिल भारतीय स्तर से लेकर ग्राम स्तर तक संगठन को जोड़ने का कार्य चल रहा हैं।  संगठन के लोग अपना-अपना कार्य कर रहे है। 

आज के परिप्रेक्ष्य में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में राजनीती ने अपना प्रभाव डाला है।  हमारी सोच, हमारे कार्य, हमारे तौर तरिके ही सभी राजनीती से प्रभावित है , स्वाभाविक है। संगठन भी अछूता नहीं है। राजनीति की कूटनीति सर्वव्यापी हो चुकी है।  व्यक्ति का मांस इस छूत की बी..
Posted By : Manohar Seervi Posted By on 06 Mar 2020, 03:44:47
आज जमाना कंपीटिशन (प्रतिस्पर्धा) का है देश में कई बच्चे सिर्फ पढ़ाई कर रहे है, कुछ पढ़ाई के साथ में पार्ट टाइम जॉब कर रहे है, तो कछ कंपीटिशन (प्रतियोगीपरीक्षाओं की तैयारी में लगे है पहले का जमाना कुछ और था पहले लोग पढ़ाई या नौकरी को लेकर इतने जागरूक नहीं थे, लेकिन आज समय के साथ साथ सब बदलता जा रहा है। आज युवा जागरूक होता जा रहा है। सबके अन्दर जुनून है, कुछ कर दिखाने की, कुछ बनने की ओर अपने लक्ष्य को हासिल करने की और उसे पूरा करते भी नजर आते है। आपने अक्सर देखा होगा कि कुछ लोग अपने लक्ष्य को अपने भाग्य के सहारे छोड़ देते है और कुछ लोग पड़ाई को चुनौती मानकर हमेशा मेहनत करते रहते है। लेकिन अगर आपको आगे बढ़ना है और कुछ कर दिखाने का जज्बा अगर आप अपने अन्दर रखते है, तो आप भी अपनी मेहनत और लगन से बन सकते है- अगले टॉपर। ये सोचने की बजाय कि अमुख व्यक्ति इतना आगे निकल गया और अमुख कम्पनी में ऊंच पद पर काम कर रहा है, जरूरी है, ख़ुद को साबित करने की इसके लिए आपको मेहनत करनी होगी और अपने भाग्य को चुनोती देनी होगी ।

रेगुलरपढ़ाई है मंत्र :- सफलता के लिए नियमबद्ध पढ़ाई जरूरी है। लो..
Posted By : Raju Seervi Posted By on 01 Mar 2020, 14:22:06
निंदा तू न गई मेरे मन से 

सहारे के बिना जबसे खड़े होने लगे हो तुम  तभी से दॄष्टि में कुछ की, कड़े होने लगे हो तुम अगर आलोचना बढ़कर बड़े करने लगे जब भी समझ लेना कि अब कद में बड़े होने लगे हो तुम। 

बंधुओं उपरोक्त मुक्तक से इस आलेख की शुरुआत करता हूँ। 

व्यक्ति की कीर्ति बढ़ने से विरोधियों तथा आलोचकों की संख्या भी बढ़ती है।  जो लोग यशस्वी व्यक्ति के साथ रहते हैं, पीठ पीछे वह भी उसकी निंदा करते हैं।  प्रसिद्ध प्राप्त करने वाले व्यक्ति के निंदक उसके ऊपर भांति-भांति के आरोप लगाते हैं। कहावत है-बदनाम जो होंगे तो क्या नाम न होगा। 

बदनाम करने वाले यह नहीं सोचते कि वह जिसकी निंदा कर रहे हैं, उसका और भी नाम हो रहा है।  जो लोग कुछ नहीं करते वही लोग, कुछ करने वालो की निंदा करते हैं।  आज हमारे समाज में ऐसे बहुत से व्यक्ति हैं, जिनके पास सामाजित धरातल पर करने के लिए कुछ भी नहीं है; लेकिन हाथ में मोबाइल है, सोशल मीडिया का सहारा है और टारगेट पर बैठा हुआ एक व्यक्ति है..। बस, यही है उनकी समाज सेवा। 

लोग परेशान रहते हैं कीं समाचार पत्रों में उसका नाम क्यों छपता  है? शासन-प्रशास..
Posted By : Raju Seervi Posted By on 28 Feb 2020, 00:55:22
उड़ते पल-बदलता समाज

आकाश में उड़ते रुई के बादल की तरह बड़ी तेजी से समय भाग रहा है। ना हम बादलों को पकड़ पाते हैं, और ना ही समय को। समय के साथ प्रकृति में बदलाव आता गया है। प्रकृति के बदलाव के साथ मानव भी बदलता गया है। मानव के बदलाव के साथ चीजें बदली। प्राकृतिक जल, रुपयों के मोल बिक रहा है। हर चीज जो हमें प्रकृति से उपलब्ध थी, अब मूल्य चुकाकर मिल रही है। इन सबके परिवर्तन से समाज में भी परिवर्तन आ रहा है। समाज में आपसी होड़ लग रही है। हर कोई कुर्सी से चिपका जा रहा है। पद की लालसा, लोलुपता ने मनुष्य को अंधा बना दिया है। समाज चंद सिक्कों पर नाच रहा है। उड़ते पलों के साथ मनुष्य में बदलाव आ गया है, सोच में परिवर्तन आया है। कुटुम्ब की जगह एकल रहना पसंद करते है। चार बच्चों की जगह - \"हम दो, हमारे दो\" की सोच हो गई हैं। भावनाओं की जगह प्रैक्टिकल लेता जा रहा है। मनुष्य सभ्यता की आड़ में शराबी एवं हिंसक बन रहा है। इन सभी का प्रभाव समाज पर पड़ रहा है। हाँ, कुछ अच्छी बातें भी समाज में हो रही है। महिलाओं की उन्नति को समाज ने स्वीकार लिया है परन्तु मन के अंह ने उन्हें अपने से निचे ही स्थान द..
Posted By : Manohar Seervi on 02 Jan 2020, 12:18:50
व्यक्ति अगर रिश्तेदार बनकर जियेगा तो रिश्ता तीर्थ स्थल बन जायेगा । परिवार रिश्तेदारों से बनता है।दावेदारों से नहीं ।यदि रिश्तों को तीर्थ नहीं बनाया तो कितनी भी तीर्थ यात्राएं कर लो कुछ फल प्राप्त होने वाला नही है। परिवार वह सुरक्षा कवच है जिसमें रह कर व्यक्ति शांति का अनुभव करता है। अगर आपके रिश्ते में पूरी तरह से विश्वास , ईमानदारी , और समझदारी है तो जीवन में आपको वचन, कसम, नियम और शर्तों की कभी जरूरत नहीं पड़ेगी ।रिश्ते में आपसी समझ होना आवश्यक है।अत: अपने रिश्तों में दावेदारी नहीं करें , रिश्तों को तीर्थ बनाने का प्रयास करें । व्यक्ति के जीवन में व्यक्तिगत समस्याएं कम होती है और संम्बंधो से उत्पन्न समस्याएं अधिक है। जब रिश्तों की मर्यादाएं टूट जाती है, तो बहुत कुछ समाप्त हो जाता है। रिश्ते आपसी सामंजस्य से बनते है।जहां वादा होता है वहां रिश्ता होता है और जहां दावा होता है वहां रिश्ता नहीं होता है। जब तक रिश्तों को निभाना नहीं सीखेंगे हम अपने जीवन में धर्म नहीं कर पायेंगे ।रिश्तों के रास्ते ही धर्म आता है। सौभाग्य आता है ।
एक जमाना था जब पर..
Posted By : Posted By seervi on 31 Jul 2019, 06:12:32
जब पति-पत्नी मानसिक रूप से एक दूसरे से घृणा करने लगे, तो वे एक छत के नीचे कब तक और कैसे रह सकते हैं? तलाक बुरा नहीं है, उसकी प्रकिया बुरी है, उसके आगे पीछे का समय असहनीय होता है। फिर लंबी प्रकिया के बाद दोनों परिवार टूट जाते हैं, एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में। इस कहानी के माध्यम से तलाक की प्रकिया को आसान बनाने की प्रयास किया गया है। किसी ने ठीक ही कहा है –

“खुशी बाँटने के लिए हजारों लोग आपको मिल जाएंगे, लेकिन दुःख में आप के साथ आसूँ बहाने वाले शायद ही मिल पायें।”

दोस्तों प्रतिदिन हम आप ज्योहीं अखबार के पन्ने पलटते हैं पाते हैं अखबार का दो से तीन पेज घरेलू हिंसा के खबरों से पटा रहता है, कहीं पति ने पत्नी का क़त्ल किया, कहीं पत्नी ने पति का। कहीं दोनों परिवार एक दूसरे पर केस डाल दिया, तो कहीं पत्नीं अपने बच्चों समेत ट्रेन से कट गई। ज्यादातर मामले पति पत्नी के संबंधों से जुड़ा रहता है, चाहे कारण दहेज हो या अन्य। टीवी न्यूज चैनल भी इसी तरह की ख़बरें दिखाते रहते हैं। आप समझ लीजिए ये घटनाएं अचानक नहीं होती, इसकी पृष्ठभूमि कई महीने या साल पहले लिखी गयी हो..
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