सीरवी समाज - ब्लॉग

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Posted By : Posted By seervi on 29 Sep 2019, 04:31:54
आलेख:-समाज में शिक्षित स्त्री औऱ पारम्परिक पारिवारिक मूल्यों पर प्रभाव:-
अपना देश विश्व में अपने सांस्कृतिक विरासत के उच्च आदर्श मूल्यों के लिए प्रसिद्ध है।इस देश के आदर्श मूल्य,परम्पराए औऱ सामाजिक प्रतिमान एक अनमोल धरोहर की तरह है।इस देश में मूल्य,परम्पराए औऱ सामाजिक प्रतिमान आनुवांशिक गुणों की तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते आए है। यह सही है कि समय के साथ उनमें कुछ परिवर्तन भी आए है।इस आलेख "समाज में शिक्षित स्त्री और पारम्परिक पारिवारिक मूल्यों पर प्रभाव" के मूल में जानने से पहले हमें स्त्री की शैक्षिक स्थिति औऱ पारम्परिक पारिवारिक मूल्यों को जानना जरूरीहै।
प्राचीन काल में शिक्षा का अभाव था।शिक्षा में भी नारी शिक्षा बहुत ही कम थी।वैदिक काल में नर-नारी को समान अधिकार थे औऱ उनके आदर्श भी थे।नारियों को पढ़ने की आजादी थी औऱ वे शास्त्रार्थ में भी भाग लेती है।मैत्रयी औऱ गार्गी इनके उदाहरण है। वैदिक काल के उत्तरार्द्ध औऱ मध्यकाल में नारी शिक्षा पर ग्रहण लग गया औऱ नारी को तत्कालीन परिस्थितियों के कारण घर की चार दीवारी में कैद ..
Posted By : Posted By seervi on 25 Sep 2019, 12:54:26
समाज में शिक्षित स्त्री ओर पारंपरिक मूल्यों पर प्रभाव 💫 विचार मेरे विचारों में 💫
नारी का शिक्षित होना न केवल एक परिवार के लिए बल्कि हमारे समाज व हमारे राष्ट्र के लिए भी परमावश्यक है | परिवार में यदि स्त्री पड़ी लिखी है तो वह परिवार का उचित मार्ग दर्शन कर सकती है | परिवार को आगे बढ़ाने में अपनी शिक्षा के बल पर वह परिवार की आर्थिक रूप से मदत कर सकती है | सामाजिक कार्यों में अपना सहयोग दे सकती है | समाज के विकास में अपना पूर्ण सहयोग प्रदान कर सामाजिक विकास को गति प्रदान कर सकती है | वर्तमान समय में एसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ नारी अपनी भूमिका न निभाती हो | शिक्षा, साहित्य, व्यवसाय, खेल, राजनीति हर क्षेत्र में नारी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हुई एक मिसाल कायम कर रही है |
🌸 शिक्षित नारी सबपे भारी
हमेशा निभाती अपनी जिम्मेदारी
कभी ना दिखाती कोई लाचारी
शिक्षित नारी कभी ना हारी 🌸
स्त्री यदि पड़ी लिखी है तो वह स्वयं तो आत्म निर्भर बनती है साथ ही उसके दोनों परिवार भी आत्मनिर्भर बनते है प्राचीन कल से लेकर वर्तमान समय तक नारी की महत्ता को ठुकराया नहीं जा सकता | प..
Posted By : Posted By seervi on 22 Sep 2019, 04:33:51
युवा किसी भी समाज के कर्णधार हैं, वे उसके भावी निर्माता हैं। चाहे वह नेता या शासक के रूप में हों , चाहे डॉक्टर, इन्जीनियर, वैज्ञानिक, साहित्यकार व कलाकार के रूप में हों। इन सभी रूपों में उनके ऊपर अपनी सभ्यता, संस्कृति, कला एवम् ज्ञान की परम्पराओं को मानवीय संवेदनाओं के साथ आगे ले जाने का गहरा दायित्व होता है। पर इसके विपरीत अगर वही युवा वर्ग उन परम्परागत विरासतों का वाहक बनने से इनकार कर दे तो निश्चिततः किसी भी राष्ट्र का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

युवा शब्द अपने आप में ही उर्जा और आन्दोलन का प्रतीक है। युवा को किसी राष्ट्र की नीव तो नहीं कहा जा सकता पर यह वह दीवार अवश्य है जिस पर राष्ट्र की भावी छतों को सम्हालने का दायित्व है। जब तक यह ऊर्जा और आन्दोलन सकारात्मक रूप में है तब तक तो ठीक है, पर ज्यों ही इसका नकारात्मक रूप में इस्तेमाल होने लगता है वह विध्वंसात्मक बन जाती है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर किन कारणों से युवा उर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है? वस्तुतः इसके पीछे जहाँ एक ओर अपनी संस्कृति और जीवन मूल्यों से दूर हटना है, ..
Posted By : Posted By seervi on 19 Sep 2019, 12:25:17
प्रिय स्वजनो
सादर वन्दे ।
सीरवी समाज मे नारी शिक्षा प्रगति पथ पर है , हर मां बाप अपनी बेटी को पढाना चाहता है, पढाता है ।

नारी शिक्षा के बारे मे सत्य कहा गया है कि एक बालिका के पढऩे से सात पीढियों को फायदा होता है । जब लडकी पढती है तो पुरा परिवार उसको सम्मान देता है , घर परिवार मोहल्ले मे उसका मान होता है , जितनी गहनता से बेटियां शिक्षा ग्रहण करने मे मन लगाती है उतना बेटे नही लगाते ।😢

समाज मे बेटियों का शैक्षणिक स्तर सुधरा है मगर माध्यमिक विद्यालयों से आगे मार्ग अवरूद्ध हो जाता है , मसलन अन्य गांव या बडे शहरों के कॉलेजों मे जाना, सगाई सगपण की तैयारियां , जवानी की दहलीज पर बढते कदम ।
उच्छ शिक्षा मे फिलहाल सीरवी समाज जितना प्रगतिशील होना चाहिए था उसके अनुपात मे बहुत कम है ,, इसके बहुत ही कारण है जैसै कम उम्र मे सगाई , अदलाबदली के सगपण , भाई-भतीज या अन्य के बदले मे उसकी सगाई , कॉलेजों मे अध्ययन हेतु अन्यो शहरो मे जाना,, कुच्छ नाममात्र लडकियों के पैर फिसलना और इसी तरह के बहुत से कारण है जो बेटियों को उच्च व उच्चतम शिक्षा मे रोडा बनते है ।
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Posted By : Posted By seervi on 15 Sep 2019, 12:41:14
विचार मेरे विचारो में - आलेख - सीरवी समाज की अच्छाईया - सबसे जुदा

समाज के सोशल मीडिया प्रारूप ने प्रिंट मीडिया के साहित्यिक प्रारूप में एक अरसे से मंदी को एक बार पुन: ताज़ी हवा का झोंखा दिया है, जिसे मेरी समझ में सीरवी समाज के सभी शिक्षाविदो को संज्ञान में लेना चाहिए l सीरवी समाज डॉट कॉम के संचालक संस्थापक और सम्पादक को इस हेतु ह्रदय से साधुवाद l

देश काल परिस्थिति विचारो का समागम अपने अन्तर्निहित अनेकानेक भावो से वस्तु विषय की कल्पना परिकल्पना प्रस्तुत करता रहता है, किसी जमाने में समाज के शिक्षाविदो द्वारा सीरवी सन्देश पत्रिका के माध्यम से समाज के साहित्यिक विचारों को सामने लाया जाता रहा है किन्तु वर्तमान में सोशल मीडिया के त्वरित सूचना आदान प्रदान की सुविधा ने एकबारगी समाज के साहित्यिक विचारों को लगाम देकर चुराए गए विचारों से सामाजिक साह्यित्यिक चेतना को छिलम छिल कर दिया l सीरवी समाज डॉट कॉम के - विचार मेरे विचारो में - प्रारूप की जानकारी हालांकि काफी देर पश्चात मुझे ज्ञात हुई, किन्तु निबंधात्मक आलेख की इस शुरुआत प्रशंशनीय है - वर्तमान आलेख ..
Posted By : Posted By seervi on 15 Sep 2019, 12:35:45
जय आईजी ।
सादर वन्दे ।
सीरवी समाज हमारा समाज है इसलिए इसके गुणगान करता हूं ,, नही,, बल्कि इस समाज की संस्कृति , सहनशीलता ,, दानत्व , अपनत्व,, मिलनसारिता,, ईमानदारी ,, सहकारिता की पुरी कायल है अन्य समाज ।

अकारण और बिना मेहनत के लेना सीरवी समाज के लिये वर्ज्य है । सीरवी समाज अपनी सादगीपूर्ण जीवन, मेहनतकश श्रम, ईमानदारी पुर्ण कर्तव्य और आस्था मे पुर्ण विश्वास और समर्पण की वजह से ही आज प्रगतवान है और तेज गति से प्रयासरत भी है , सीरवी समाज आज अन्य समाजों के लिये एक आदर्श बन रहा है, अन्य समाजों के लोग आज सीरवी समाज से प्रेरणा ले रहे है ।

मगर आज भी समाज का लक्ष्य पुरा नही हुआ है , समाज की सोच विशाल है, चंचलता से परिपुर्ण कर रहे है ,, आगे बढने की ललक और प्रतिस्पर्धात्मक युग मे भी अपने पांव जमाये ही नही है बल्कि और मजबूती प्रदान कर रहा है ।अन्य विजातिय सामाजिक लोग हमारी नकल करने लगे है और हमारे पदचिन्हों पर चलकर सफल हो रहे है , और यह भी सीरवी समाज के लिये गर्व की बात है कि हम उनके लिये प्रेरणास्त्रोत बन रहे है क्योंकि हमने देना ही सीखा है ,, याचकता से को..
Posted By : Posted By seervi on 15 Sep 2019, 07:05:39
🙏🏽सीरवी समाज की अच्छाइया सबसे जुदा 🙏🏽
हम सभी जानते है की समाज के बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है | समाज हमारे जीवन का एक अटूट हिस्सा है | हमारे कई क्रियाकलाप समाज पर ही निर्भर करते है देखा जाए तो समाज हमारे लिए एक दर्पण का कार्य करता है जिसमें हम अपने प्रतिबिंब को देख सकते है | समाज में संघटन होता है, अनुशासन होता है, नैतिक मूल्य होते है | परम्पराए व रीती रिवाज़ होते है | एक विकसित समाज से ही एक विकसित राष्ट्र की कल्पना की जाती है | एक विकसित समाज राष्ट्र को उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचाता है | अपने कर्तव्यो व अपने दायित्वो का उचित निर्वहन करते हुए पुरे राष्ट्र में अपनी पहचान बनाता है | ऐसी ही एक पहचान बनाई है हमारे सीरवी समाज ने | सीरवी समाज की अछाईयो ने पुरे भारत वर्ष को मोहित कर दिया है | एक ऐसा समाज जिसका व्यवसाय मात्र अब खेती करना नहीं रह गया है, बल्कि हमारे समाज ने अपने कार्यों के बल पर, हर क्षेत्र में अपना परचम लहराया है | चाहे वह खेलकूद से सबंधित हो, व्यवसाय से संबंधित हो या शिक्षा से सम्बंधित हो | हर क्षेत्र में सीरवी समाज ने अपने शक्ति पुंज को दर्शया है |
स..
Posted By : Posted By seervi on 15 Sep 2019, 04:15:07
विचार मेरे विचारो में - आलेख - सीरवी समाज की अच्छाईया - सबसे जुदा सबसे अलग
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो अपने जीवन पर्यंत विभिन्न गतिविधियों में संलग्न रहता है, जैसे दैनिक क्रियाये, मेल-मिलाप, जीवन निर्वाह हेतु कृषि, रोजगार, व्यापार इत्यादि तथा माता पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहिन आदि रूपों में समाज में रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करता है l समाज व् मानव दोनों का अस्तित्व एक दुसरे पर निर्भर करता है l सुख-दुःख मानव जीवन रूपी सिक्के के दो पहलु है, एक अच्छा समाज मानव को इन्ही सब उतार चढावो से उबारने में सहयोग करता है l संस्कृति, लोगो का मोलिकता से जुड़ाव, पारस्परिक सद्भावना, शिष्टता, आध्यात्म, सहायता, प्रवृति, सहजता, उदारता आदि एक अच्छे समाज की विशेषताए है तथा इन्ही सब विशेषताओं को समाहित करता सीरवी समाज आज अपनी अच्छाइयो के फलस्वरूप प्रगति के मार्ग पर अग्रसर है l
सीरवी समाज के इतिहास के अबरे में सभी जानते है प्रारम्भिक रूप में कृषक जाती के रूप में उभरा यह समाज आज विभिन्न क्षेत्रो जैसे शिक्षा, चिकित्सा, खेल, व्यापार, अभियांत्रिकी, सिविल सेवा आदि में अपना योग..
Posted By : Posted By seervi on 13 Sep 2019, 05:49:03
सीरवी समाज की अच्छाईयां.. सबसे जुदा। -----------------------------

वैसे तो कुदरत के कानून जैसे दिन के साथ रात की तरह अच्छाईयों के साथ बुराईयां विद्यमान रहती है। फिर भी एक सकारात्मक दृष्टिकोण की उपज है इस बार का यह शीर्षक..साधुवाद।

हमारा ध्यान भी आजकल सभी की बुराइयों की तरफ पहले जाता है इसलिए अच्छाईयां इतनी नजर नही आती लेकिन सभी में बहुत सारी अच्छाईयां होती है।
स्वार्थ के माहौल के कारण हम उसका जिक्र कम करते है अतः हमें उसका अहसास होना कम हो गया है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, सबका अपना एक समाज है। सभी समाजों की तरह सीरवी समाज में भी बहुत सी अच्छाईयां है, और वो भी सबसे अलग, कुछ इस तरह...

1. साथ- मन से सच्चे बनाम अच्छे लोग एक दूसरे का सहयोग करते हुए साझे में मेहनतकश कृषिकार्य करते हुए साथ रहने लगे। इसी कारण वो सीरवी कहलाएं। साथ रहना अपने आप में बहुत बडा गुण था जो आज की एक बहुत बडी अच्छाई है। सीरवी समाज के जीवन की यह सच्चाई है।

और इसी एक प्रबल गुण के कारण हम और समाजों से भी हिल मिल रहते हुए जीवन यापन करते है। अर्थात ईश्वर के बनाएं सभी एक जीवात्मा संविधान का हम पालन ..
Posted By : Posted By seervi on 12 Sep 2019, 03:19:23
एक गांव मे अंधे पति-पत्नी रहते थे । इनके यहाँ एक सुन्दर बेटा पैदा हुआ। पर वो अंधा नही था।

एक बार पत्नी रोटी बना रही थी। उस समय बिल्ली रसोई में घुस कर बनाई रोटियां खा गई।
बिल्ली की रसोईं मे आने की रोज की आदत बन गई इस कारण दोनों को कई दिनों तक भूखा सोना पड़ा।
एक दिन किसी प्रकार से मालूम पड़ा कि रोटियाँ बिल्ली खा जाती है।
अब पत्नी जब रोटी बनाती उस समय पति दरवाजे के पास बाँस का फटका लेकर जमीन पर पटकता।
इससे बिल्ली का आना बंद हो गया।
जब लङका बङा हुआ और उसकी शादी हुई।
बहू जब पहली बार रोटी बना रही थी तो उसका पति बाँस का फटका लेकर बैठ गया औऱ फट फट करने लगा।

कई दिन बीत जाने के बाद पत्नी ने उससे पूछा कि तुम रोज रसोई के दरवाजे पर बैठ कर बाँस का फटका क्यों पीटते हो?
पति ने जवाब दिया कि
ये हमारे घर की परम्परा (रिवाज) है इसलिए मैं ऐसा कर रहा हूँ।

कहानी का सार:
माँ बाप तो अंधे थे, जो बिल्ली को देख नहीं पाते थे, उनकी मजबूरी थी इसलिये फटका लगाते थे। पर बेटा तो आँख का अंधा नही था पर अकल का अंधा था,
इसलिये वह भी वैसा करता था जैसा माँ-बाप करते थे।

ऐसी ही दशा आज के अपन..
Posted By : Posted By seervi on 12 Sep 2019, 03:18:20
सीरवी समाज की अच्छाईयां - सबसे जुदा

सीरवी समाज की अच्छाईयां बताने के लिए समाज की उत्तपत्ति के बारे में बताने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
सीरवी समाज की अच्छाईयां तो सीरवी समाज के कुल में पैदा हुए व्यक्ति के व्यवहार से पता चल जाती है
सीरवी समाज में कई ऐसी अच्छाईयां हे जो हमने कभी किसी समाज में न देखी होगी न सुनी होगी ।
" समाज की विशेषताये "
1) सरल व्यवहार - सीरवी बंधू का व्यवहार इतना सरल है कि दुनिया के किसी भी कोने में बैठा हो दुसरो के मान में अपने लिए जगह बना ही लेता है ।
2) सहायता - आज जमीन से उठा सीरवी ,समाज की सहायता के लिए ऑफिस खोल रहा है । परिवार के पालन , चिकित्सा का क्षेत्र , खेलकूद में या पढ़ाई के क्षेत्र में समाज से पैसा एकत्रित करके समाज की मदद के लिए आगे आया है ।
3) मेहनती - मेहनत का नाम सुन कर
ही किसान का चेहरा आँखों से गुजर जाता है । सीरवी तो जमीन से खड़ा हुआ है ,जमीन से खड़ा होना मतलब अन्न पैदा करना , चाहे कोई भी मौसम हो सर्दी , बारिश या कड़कती धुप सीरवी किसान खून पसीना एक करके परिवार का पालन पोषण करता हे ।सीरवी समाज की मेहनत का परिणाम ही आज उन्नति का शिख..
Posted By : Posted By seervi on 11 Sep 2019, 04:36:28
विचार मेरे विचारो में - पाक्षिक आलेख - सीरवी समाज की अच्छाईया - सबसे जुदा सबसे अलग

भारत देश में अनेको धर्म है l सभी धर्मो के लोगो में आपसी सोहार्द व् भाईचारा है l यहाँ समाज जातिगत पहलुओ पर विभक्त है l जिसमे से एक जाती का उल्लेख लोग बड़े गर्व भाव से करते है l और वो जाती है खारड़िया सीरवी -
सीरवी जाती पुरातन काल से ही अपनी विशिष्टताओ और प्रेम शान्ति के लिए जाना जाता है l सीरवी समाज के लोग बेहद ही सुशील तथा शांतिप्रिय होते है तथा सदेव ही दीं दुखी लोगो की सहायता व् मदद के लिए तत्पर रहते है l यही कारण है की आज देश विदेश में कही न कही सीरवी समाज के चेरिटेबल ट्रस्ट जरुर मिलते है l
मैं यहाँ सीरवी समाज की कुछ ऐसी ही अच्छाइयो का उल्लेख करने जा रहा हु -
1. परम्पराओ और रीती रिवाजो के प्रति पूर्ण सम्मान इस आधुनिकतावाद में भी सीरवी समाज अपनी परम्पराव और रीती रिवाजो के निर्वहन बेहद ही शालीन तरीके से करता है l जैसे शादी विवाह पारंपरिक पोशाक में करना छोटे नवजातो के जड़ोलिए की रस्म इत्यादि l
2. दूसरी जातियों का सम्मान करना - माँ आईजी के पथ का अनुसरण करते हुए सीरवी समाज के द्वारा द..
Posted By : Posted By seervi on 11 Sep 2019, 04:35:17
संदेश को पढो /गढो /और आगे बढो.....

फेसबुक से प्राप्त पोस्ट...

गौत्र.....👈🏿

पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नही होता |

आइए जाने क्यूँ ?

अब एक बात ध्यान दें की स्त्री में गुणसूत्र xx होते है और पुरुष में xy होते है ।

इनकी सन्तति में माना की पुत्र हुआ (xy गुणसूत्र). इस पुत्र में y गुणसूत्र पिता से ही आया यह तो निश्चित ही है क्यू की माता में तो y गुणसूत्र होता ही नही !
और यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र). यह गुण सूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों से आते है ।

१. xx गुणसूत्र

xx गुणसूत्र अर्थात पुत्री . xx गुणसूत्र के जोड़े में एक x गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा x गुणसूत्र माता से आता है . तथा इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है जिसे Crossover कहा जाता है ।

२. xy गुणसूत्र

xy गुणसूत्र अर्थात पुत्र पुत्र में y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्यू की माता में y गुणसूत्र है ही नही । और दोनों गुणसूत्र असमान होने के कारन पूर्ण Crossover नही होता केवल ५ % तक ही होता है । और ९ ५ % y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही रहता है ।

तो महत्त्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ । क्यू की y गु..
Posted By : Posted By seervi on 10 Sep 2019, 13:21:21
Banwarilal was a samosa seller in an Indian town. He used to sell 500 samosas everyday on a cart in his locality. People liked his samosas for last 30 years, because he cared for hygiene in preparation and selling, would use good quality oil and other ingredients, provide free chutneys with samosas. He would throw all unsold samosas to poor people, cow, dogs etc and did not sell unsold stale samosas to people next day.

Banwari earned good reputation and enough money from samosa selling and he never faced downfall in his sale in last 30 years. He was able to fund his son's MBA education in a famous private college in Noida out of his earnings.

Recently his son Rohit completed his MBA and came back home as he could not get appropriate placement. Rohit started taking interest in his father's samosa business. He had not been involved in his father's business earlier as he considered that to be an inferior job.

During MBA, Rohit read a lot on recession. He read that it is coming up in global economy and how it will affect job prospects, increase unemployment etc. So he thought that he should advise his father of the risks in the business of samosa selling on account of recession.

He told his father that recession may cause fall in sale of samosas, so he should prepare for cost cutting to maintain the profit.

Banwari was glad that his son knows so much about business and taking interest in his business. He agreed to follow advice of his son.

Next day, Rohit suggested using 20% used cooking oil and 80% fresh. People did not notice the change in the taste and 500 samosas were sold.

Rohit was motivated by the profit made by this savings. Next day he suggested increased share of used oil to 30% and reduce the quantity of free chutney.

That day, only 400 samosas were sold and 100 samosas were thrown to poor people and dogs.

Rohit told his father that recession has really set in as predicted by him, so more cost cutting is to be done and they would not throw stale samosas but would fry them again next day and sell them. Quantity of used oil will also be increased to 40% and to make only 400 samosas to avoid wastage.

Next day 400 samosas were sold but customers were not feeling good old taste. But Rohit told his father about savings because of his smart planning. Father told him that he may be knowing better, being educated.

Next day Rohit decided to us..
Posted By : Posted By on 09 Sep 2019, 06:10:04
ये कहानी देखने के बाद खुद को रोक नहीं पाया पोस्ट करने से

बस परिस्थितया थोड़ी भिन्न रही है
पूरी कहानी पढियेगा...
वो विधवा थी पर श्रृंगार ऐसा कर के रखती थी कि पूछो मत। बिंदी के सिवाय सब कुछ लगाती थी। पूरी कॉलोनी में उनके चर्चे थे। उनका एक बेटा भी था जो अभी नौंवी कक्षा में था । पति रेलवे में थे उनके गुजर जाने के बाद रेलवे ने उन्हें एक छोटी से नौकरी दे दी थी । उनके जलवे अलग ही थे । 1980 के दशक में बॉय कटिंग रखती थी । सभी कालोनी की आंटियां उन्हें 'परकटी' कहती थी । 'गोपाल' भी उस समय नया नया जवान हुआ था । अभी 16 साल का ही था । लेकिन घर बसाने के सपने देखने शुरू कर दिए थे । गोपाल का आधा दिन आईने के सामने गुजरता था और बाकि आधा परकटी आंटी की गली के चक्कर काटने में।
गोपाल का नव व्यस्क मस्तिष्क इस मामले में काम नहीं करता था कि समाज क्या कहेगा ? यदि उसके दिल की बात किसी को मालूम हो गई तो ? उसे किसी की परवाह नहीं थी । परकटी आंटी को दिन में एक बार देखना उसका जूनून था ।
उस दिन बारिश अच्छी हुई थी । गोपाल स्कूल से लौट रहा था । साइकिल पर ख्वाबो में गुम उसे पता ही नहीं लगा कि अगले मोड़ पर कीचड़ क..
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