सीरवी समाज - ब्लॉग

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Posted By : Posted By seervi on 09 Sep 2019, 05:49:31
विचार मेरे विचारो में - आलेख - सीरवी समाज सबसे जुदा

सीरवी जाती का आज से लगभग 800 वर्ष पूर्व हुआ है l सीरवी जाती मुख्यत: राजस्थान प्रदेश के मारवाड़ व् गोडवाड़ क्षेत्र में कम संख्या है l
सीरवी जाती खारड़िया राजपूतो के वंशज है, खारड़िया राजपूत पहले जालोर के साका के नाम से प्रसिद्द थे l फिर बदलते समय के साथ वहा की परिस्थितिया अनुकूल न होने के कारण उन्होंने वहा से पलायन कर पाली व् जोधपुर जिलो के गाँवों में आकर बस गए l ये लोग यहाँ पर पूर्व में बसे जनवो के साथ सीर साझे में खेती करने लग गए l फिर यह खेती इनका मुख्य व्यवसाय बन गया l
आज समय के साथ सीरवी समाज के लोगो ने अपने विकास व् समाज विकास के लिए यहाँ से अपने व्यवसाय के कारण दक्षिण भारत में है l सीरवी समाज के लोग देवी श्री आई माता के अनुयायी है और इनके ही उपासक है l आई माता के मंदिर को "बढेर" कहा जाता है l आज के इस आधुनिक युग में भी सीरवी समाज के लोग अपने रीती रिवाज संसकारो को नहीं भूले है वो आज भी अपने सारे प्रसंग, त्यौहार, उत्सव, अपने रीती रिवाजो से करते है l
आज सीरवी समाज के लोगो ने अपने परिश्रम कला व् अथक प्रयासों से हर क्षेत..
Posted By : Posted By seervi on 09 Sep 2019, 05:42:32
विचार मेरे विचारो में - आलेख - सीरवी समाज सबसे जुदा
सीरवी एक जाती है जो आज से लगभग 800 वर्ष पूर्व अलग ह्जोकर राजस्थान के मारवाड़ और गोड्वाड क्षेत्र में रह रही थी ल कालांतर में यह जाती राजस्थान के जोधपुर और पाली जिले में कम संख्या में पायी जाती है
सीरवी समाज के इतिहास का बहुत कम प्रमाण उपलब्ध है lखारादिया राजपूतो का शाशन जालोर पर था व् राजा कान्हडदेव चौहान वंशीय थे उन्ही के वंश 24 गौत्रीय खारड़िया सीरवी कहलाये l
अत: वैशाख सुद 5 विक्रम संवत 1368 को खारड़िया राजपूतो ने साका किया l जो इतिहास में जालोर के साका के नाम से प्रसिद्द है l
खारड़िया राजपूतो ने 600 बेलगाडीयो में अपना सामान लादकर पाली व् जोधपुर जिले की तरफ प्रस्थान किया और लूनी नदी के आस पास के क्षेत्र में जहा सिचाई के पानी की पर्याप्त सुविधा थी, वहा बस गए l ये लोग यहाँ पर पूर्व में बसे जनवो के साथ सीर साझे में खेती करने के कारण सीरवी कहलाये l खारड़िया राजपूतो ने तलवार का मोह त्याग कर वर्षो से बंजर पड़ी भूमि को अपने हाथो से हल चलाकर उपजाऊ बनाया l फिर यही खेती इनका मुख्या व्यवसाय बन गया l जिस जिस खेत्र में उपजाऊ जमीन व् ..
Posted By : Posted By seervi on 07 Sep 2019, 05:39:19
आलेख:-सीरवी समाज की अच्छाइयां-सबसे जुदा ।

प्रत्येक समाज की अपनी कुछ अच्छाइयां अर्थात विशेषताएं होती है तो कुछ अपनी कमियां भी।
सीरवी समाज भी एक ऐसा ही समाज है जिसके अतीत में झांके तो अच्छाइयां ही अच्छाइयां नजर आती है। यह सही है कि वक्त के साथ समाज की अच्छाईयों पर ग्रहण भी लगा है औऱ समाज की वे खूबसूरत प्रतिमान औऱ सामाजिक आदर्श मूल्य अर्थात अच्छाइयां छिन्न-भिन्न भी हुई है लेकिन आज भी सीरवी समाज में बहुत-सी अच्छाइयां है जो सबसे जुदा है।
सीरवी समाज की अच्छाइयां पर प्रकाश डालने से पहले हमें यह जानना जरूरी है कि वास्तव में अच्छाइयां है क्या ?
मानव समाज में अच्छाइयां का अपना एक स्तर है जो सामाजिक,धार्मिक औऱ भौगोलिक परिस्थितियों के साथ अपना एक अलग अस्तित्व है।एक समाज के आदर्श प्रतिमान उस समाज के लिए अच्छाइयां है तो अन्य समाज के लिए वे बुराइयां है।एक धर्म के कुछ नियम उनके लिए अच्छाइयां है तो वही अन्य धर्म के लिए उनका कोई मूल्य नही है अर्थात वे बुराइयां है।
इसी प्रकार से एक क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगो के सामाजिक प्रतिमान औऱ मानवीय मूल्य उन..
Posted By : Posted By seervi on 05 Sep 2019, 03:24:11
राष्ट्र निर्माण और शिक्षक ।
भारत के महान विचारक,चिंतक,शिक्षक,लेखक औऱ श्रेष्ठ प्रशासक के रूप में विख्यात महापुरुष चाणक्य ने शिक्षक समाज के संदर्भ में कहा था कि,"शिक्षक गौरव घोषित तब होगा,जब ये राष्ट्र गौरवशाली होगा,औऱ ये राष्ट्र गौरवशाली तब होगा,जब ये राष्ट्र अपने जीवन मूल्यों एवं परम्पराओ का निर्वाह करने में सफल एवं सक्षम होगा और ये राष्ट्र सफल एवं सक्षम तब होगा,जब शिक्षक अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करने में सफल होगा और शिक्षक सफल तब कहा जायेगा,जब वह राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति में राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करने में सफल हो। यदि व्यक्ति राष्ट्रभाव से शून्य है,राष्ट्र भाव से हीन है,अपनी राष्ट्रीयता के प्रति सजग नही है तो ये शिक्षक की असफलता है।"
महान शिक्षक चाणक्य के विचार को हृदय की गहराई से मंथन-चिंतन करने की जरूरत है।इस विचार में राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका को बहुत ही सुंदर ढंग से परिभाषित किया गया है औऱ राष्ट्र के प्रति उसके उत्तरदायित्व को बताया गया है।
शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर मेरे मन के विचार आप सभी बुद्धिजीवियों ..
Posted By : Posted By seervi on 03 Sep 2019, 06:06:11
सीरवी समाज की अच्छाइयां सबसे जुदा -------------------------------------------
सीर कियो जद सीरवी सो जाणे संसार ,सीरवी समाज बहुत ही सरल ,सुलझी हुई व शांति प्रिय कौम है!आपस में हिलमिल कर रहना ,सादा जीवन उच्च विचार ,चाहे खेती हो या व्यापार अपनी मेहनत व हूनर के बल पर बनाई है अपनी अलग पहचान ! सेवाभाव,मेहनतकश व ईमानदारी इस समाज की अच्छी खूबियां है ,लेकिन जो सबसे अच्छी खूबी है वह है परिस्थिति के अनुसार सामंजस्य-चाहे शादी ब्याह का समारोह हो या फिर कोई अन्य फंक्शन उनमें लोग अपनी हैसियत के अनुसार सम्पन्न कर लेते है तो उसमें कोई शिकवा शिकायत नहीं करते हैं!विवाह की रस्में बड़े ही सादगीपूर्ण ढंग से सम्पन्न कर दी जाती है,सामने वाले समधी यानि वरपक्ष की ओर से कोई विशेष डिमांड नहीं होती है!जब कि अन्य कौमो छोटी मोटी जातियों में हम अक्सर देखते है कि इन अवसरों पर अजीब अजीब मांगे रख दी जाती है जो मजबूरी में लड़की के पिता को हैसियत न होते हुए भी पूरी करनी पड़ती है!ऐसा खाना होना चाहिए ,बारातियों का स्वागत ऐसा होना चाहिए,दुल्हें के लिये व और भी फलाना ठीमका तरह तरह की अजीबोगरीब मांगे रख देते है जो पूरी न ह..
Posted By : Posted By seervi on 30 Aug 2019, 05:05:16
इन्फॉर्मेशन और बदलाव:

मानव जीवन की एक अभिलाषा रही है ज्ञान अर्जित करना , ज्ञान यानी नॉलेज जानकारी गर्भसार...


ज्ञान विषय वस्तु की वो जड़ जो हमें सत्य से मुलाकात करवाती है....

बात कर रहे है ज्ञान की..
इन्फॉर्मेशन आते ही हमारे अंदर परिवर्तन आने शुरू हो जाते हैं जो जटिल केमिकल का निर्माण करते हैं....

मतलब ज्ञान (इन्फॉर्मेशन) आने के साथ हमारे शरीर में परिवर्तन आते है। परिवर्तन निर्माण करते है क्या सोचते हैं वो बनाने में। यह कैसे होता है इसे एक उदाहरण से समझते हैं -

मान लीजिए की आप को कहा जाए आप सपने में भाग रहे है और आपके पीछे शेर पडा हुआ है। एक लपक और आपकी मृत्यु (वैसे सपने में कोई भी अपने आप को मरता हुआ नहीं देख सकता) निकट , फटाक से आपकी नींद खुल जाती हैऔर आप महसूस करते हैं पैर थके हुए सर पर पसीना ब्लड प्रेशर हाई।

भौतिक रूप से देखें तो आप के साथ ऐसा कुछ हुआ नहीं , तो फिर शरीर में आए बदलाव किसने किए ?

वो आपकी इन्फॉर्मेशन है....

ज्ञान सकारात्मक हो सकता है नकारात्मक भी...
पर बदलाव होते है ज्ञान से..

उस बदलाव से आपका व्यवहार निश्..
Posted By : Posted By seervi on 29 Aug 2019, 07:44:55
देश का बटवारा हुआ, सबने अपने अपने हिसाब से माँगा, खोया, पाया l
प्रकृति ने हमारा पलायन किया, हमने भी माँगा, खोया और पाया l

क्या खोया और क्या पाया शायद इस लेख से समझ आये - मुझे तो आया l
सिंध का बंटवारा पंजाब और बंगाल से अलग है !

सिंध को हमसे बिछड़े 70 बरस हुए !
सिंधियों की जो पीढ़ी बंटवारे के दौरान इस पार आई थी
उनमें से ज्यादातर अब इस दुनिया में नहीं हैं .
बचे-खुचे कुछ बूढ़ों की धुंधली यादों के सिवा अब सिंध सिर्फ हमारे राष्ट्रगान में रह गया है .
इन 70 सालों में हमें यह एहसास ही नहीं हुआ
कि हमने सिंध को खो दिया है .
इस बीच सिंधियों की दो पीढ़ियां आ गई है
पर सिंध और सिंधियों के पलायन के बारे में हम अब भी ज्यादा कुछ नहीं जानते .

बंटवारे का सबसे ज्यादा असर जिन तीन कौमों पर पड़ा
उनमें पंजाबी ,बंगाली और सिंधी थे .
मगर बंटवारे का सारा साहित्य फिल्में और तस्वीरें पंजाब और बंगाल की कहानियां से भरी है .
मंटो के अफसानों से भीष्म साहनी की 'तमस' तक बंटवारे के साहित्य मे पंजाब और बंगाल की कहानियां हैं .
सिंध उनमें कहीं नहीं है.
पंजाबी और बंगालियों के मुकाब..
Posted By : Posted By seervi on 29 Aug 2019, 04:59:30
जब में लिखने बैठता हु, सोचने बैठता हु की क्या लिखू - तब सबसे पहले मेरे मन में ख़याल आता है की मेरे लेखन का दायरा कितना होना चाहिए l सीरवी समाज के आदरणीय गणमान्य नागरिको हर सोच का एक दायरा होता है, आजकल हम सोशल मीडिया पर विभिन्न तरीके के विचारो से रूबरू होते है, प्रत्येक विचार को जब हम पढ़ते है तब हम उसे मन ही मन अपने दायरे में समाहित कर के समझने की कोशिश करते है, प्रत्येक विचार अपने समझने वाले को अलग अलग मानसिकता से ग्रसित करता है, इसमें उस विचार की मूल अवधारण भी कभी कभी गायब हो जाती है, क्यूंकि पाठक की मानसिकता उस विचार में वही देखती है जो वह देखना चाहती है l अर्थार्थ सभी का अपना अपना एक सही होता है और उसी मुताबिक़ मानसिकता भी होती हैहर द्रश्य या लिखित उसी मानसिकता के प्रभाव को इंगित करते हुए समझने में आती है l
मेरे परम मित्र श्री हीराराम गहलोत जो की पेशे से अध्यापक है शिक्षाविद है के द्वारा अभी हाल ही में एक बहुत ही प्रेरणादायक लेख सामने आया है जिसके अनुसार यह चिंता जाहिर की गयी है की "आखिर हमारी यह सोच कब बदलेगी? क्या हम ऐसी घटिया मानसिकता से समाज का उत्थान कर पा..
Posted By : Posted By seervi on 28 Aug 2019, 03:10:57
शिक्षा हमे अपनी मुश्किलों से आगे देखना सिखाती हैं

शिक्षा का मुलभुत महत्व व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास में निहित हैं , और जहा विकास के पथ गमन की बात हो चुनोतिया और मुश्किलें रूपी रुकावते ठोकर के रूप में जरूर आती हैं ; शिक्षा प्राप्त व्यक्ति इन ठोकरों को कैसे पार करना या कैसे बचना हैं उसको समझता ही नहीं बल्कि दूसरो के लिए भी वो ठोकर से बचने का मार्गदर्शन करता हैं !

आदिकाल से अभी तक किये गए अविष्कारों में शिक्षा ही केंद्र रही हैं जिसने नित नए प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया और मानव को जंगलो से निकाल कर उसको मोहन जोदड़ो समृद्ध सभ्यता से भी आगे स्मार्ट सिटी में रहने तक का सफर दिखवाया ! पुराने ज़माने की दैनिक जीवन की कठिनाओ को हम शिक्षा रूपी कुल्हाड़ी से काट पाए और जीवन में नए चीजों की तरफ देख पाए | यह क्रम शिक्षा के उद्गमन से निरंतरता लिए हुए हैं !

शिक्षा से हम क्या प्राप्त करते हैं ? समग्र बुद्धि ! जो की चेतना देती हैं और चेतना से ही अपने आस पास के आवरण की आभा महसूस होती हैं , इसी आभास से उचित निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि होती हैं और इस प्रकार लिया गय..
Posted By : Posted By seervi on 25 Aug 2019, 13:16:32
शिक्षा का महत्व सदियों पुराना है । शिक्षा ग्रहण करना यानि अपने आप को निखारना । अपनी कुशाग्रता बढाना , चंचलता बढाना होता है । शिक्षा ग्रहण करने से हम सामाजिक साहित्यों का अध्ययन कर सकते है, लेखाजोखा रख सकते है, लेनदेन का सही हिसाब रख सकते है और भी अनगिनत फायदे है , कहते भी है और सत्य भी है कि पढेलिखे को चार आंखें होती है ।
भारतीय संविधानानुसार हर एक को शिक्षा देना हमारा कर्तव्य है और शिक्षा ग्रहण करना हर बालक का अधिकार है और यह फर्ज हमे पुरा करने का अवश्य प्रयत्न करना ही चाहिए । उसके साथ साथ हमे अपने बच्चों को धार्मिक , मानवीय शिक्षाओं से भी रूबरु करवाना चाहिए । जहां विद्यालयीन शिक्षा उसे पढना लिखना सिखाती है , वहीं धार्मिक, और मानवीय शिक्षा उसे संस्कारों के प्रति जागरूक करती है, आडंबरों व अंधविश्वासों से दूर करती है , अपने आप को वैचारिक मजबूती मिलती हैं। और भी अनगिनत लाभ है शिक्षा पाने के ।
हमे यह सबसे पहले सोचना है कि बच्चों को मातृभाषा मे दी जानेवाली शिक्षा सबसे ज्यादा असरदायक रहती है , अपनत्व रहता है , अन्य भाषाओं की सिखावट की तरह उसको अपनी मातृ..
Posted By : Posted By seervi on 25 Aug 2019, 04:02:17
हमारे यहाँ एक दिक्कत है हम अपने आप को छोड़कर दुसरो को सपोर्ट करने में विश्वास रखते है, जबकि अगर आप अपने आप को जबतक सक्षम नहीं बनाएंगे तब तक आप कैसे किसी की सहायता कर पाएंगे। अगर मैं भटक जाउंगा तो आप क्या करेंगे, सवाल करेंगे या नहीं। यही हम गलत हो जाते है। अगर हम भटक गए तो आप पहले समझिये अच्छी बात है लेकिन आप जबतक मुझसे सवाल नहीं करेंगे तबतक मुझे अपनी गलती का एहसास नहीं होगा। जब आप पूछेंगे तो मैं सोचूंगा ना उससे पहले तक तो मुझे पता है मैं सही हूँ। क्योंकि किसी ने अभी तक सवाल नहीं किया, हम पहले अपने अंदर गलती ढूंढने लगते है। क्योंकि जहाँ आपने यह सोचा की समझने का प्रयत्न करेंगे वही आप उसके प्रति सही सोचने लगे, की वह सही हो सकता है।

जबतक आप पूछेंगे नहीं उसको सही गलत का फर्क पता नहीं चलेगा, अगर आप पूछेंगे तो आपको जवाब मिलेगा। हो सकता है वह सही हो लेकिन उसको अभी तक सोचने का मौका ही नहीं मिला। क्योंकि आपने ऊँगली उठाई तो उसको सोचने का मौका मिलेगा। जब सवाल जवाब होता है तो एक भावार्थ निकल कर आता है जिससे पता चलता है क्या सही है क्या गलत, हो सकता है आपने सवाल किया वह गलत ह..
Posted By : Posted By seervi on 24 Aug 2019, 04:27:58
"पापा जी ! पंचायत इकठ्ठी हो गई , अब बँटवारा कर दो।" कृपाशंकर जी के बड़े लड़के गिरीश ने रूखे लहजे में कहा।

"हाँ पापा जी ! कर दो बँटवारा अब इकठ्ठे नहीं रहा जाता" छोटे लड़के कुनाल ने भी उसी लहजे में कहा।

पंचायत बैठ चुकी थी, सब इकट्ठा थे।

कृपाशंकर जी भी पहुँचे।

"जब साथ में निर्वाह न हो तो औलाद को अलग कर देना ही ठीक है , अब यह बताओ तुम किस बेटे के साथ रहोगे ?" सरपंच ने कृपाशंकर जी के कन्धे पर हाथ रख कर के पूछा।

कृपाशंकर जी सोच में शायद सुननें की बजाय कुछ सोच रहे थे। सोचने लगे वो दिन जब इन्ही गिरीश और कुनाल की किलकारियों के बगैर एक पल भी नहीं रह पाते थे। वे बच्चे अब बहुत बड़े हो गये थे।

अचानक गिरीश की बात पर ध्यानभंग हुआ,

"अरे इसमें क्या पूछना, छ: महीने पापा जी मेरे साथ रहेंगे और छ: महीने छोटे के पास रहेंगे।"

"चलो तुम्हारा तो फैसला हो गया, अब करें जायदाद का बँटवारा ???" सरपंच बोला।

कृपाशंकर जी जो काफी देर से सिर झुकाए सोच मे बैठे थे, एकदम उठ के खड़े हो गये और क्रोध से आंखें तरेर के बोले,

"अबे ओये सरपंच, कैसा फैसला हो गया ? अब मैं करूंगा फैसला, इन दोनों लड़कों को ..
Posted By : Posted By seervi on 24 Aug 2019, 03:48:35
शीर्षक:-बिन पुरुषार्थ सफलता कहाँ?

किसी कवि ने क्या खूब लिखा है कि
"बिना काम के मुकाम कैसा?
बिना मेहनत के,दाम कैसा?
जब तक ना हासिल हो मंजिल,
तो राह में,राही आराम कैसा?
यह हर उस व्यक्ति के लिए सफलता का बड़ा मूलमंत्र है जो पुरुषार्थ को साथ लेकर ढृढ इरादों से मंजिल की धुन में आगे बढ़ते रहते है।ऐसे व्यक्ति ही जीवन मे सफलता को अर्जित करते है औऱ वे अपने सपने को साकार कर जाते है।
विश्व के महान दार्शनिक औऱ विचारक सुकरात ने कहा था कि,"सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति वह है,जो प्रगति के लिए सर्वश्रेष्ठ परिश्रम करता है।" जो व्यक्ति सफलता पाने का इच्छुक होते है और हर हाल में सफलता पाने के लिए कठोर परिश्रम करता है।वे अपने निहित लक्ष्य को पाने के लिए तनिक भी विश्राम नही करते है और न ही अपने लक्ष्य को निगाहों से ओझल होने देते है।ऐसे व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंचते है। पुरुषार्थी व्यक्ति दृढ़ इरादों के धनी होते है,वे समय को नियोजित कर पुरुषार्थ करते है।ऐसे व्यक्ति सकारात्मक विचारधारा के साथ आगे बढ़ते है।वे अपने जीवन मे असफल हो भी जाते है तो निराश नही होते है।वे सतत अपने को इस ..
Posted By : Posted By seervi on 24 Aug 2019, 03:46:52
निबंध:-शिक्षा हमें अपनी मुश्किलों से आगे देखना सिखाती है।
शिक्षा एक प्रकाश का वह स्रोत है जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हमारा सच्चा पथ प्रदर्शक करती है।शिक्षा हमें अज्ञानता से बाहर निकालती है।शिक्षा अंधेरे से उजाले की ओर ले जाती है।हम सब शिक्षा की महत्ता जानते है।शिक्षा एक दिव्य प्रकाश पुंज है जिससे सर्वत्र उजियारा ही उजियारा होता है।
शिक्षा शब्द संस्कृत के 'शिक्ष' धातु से बना है जिसका अर्थ है -सीखना औऱ सिखाना। अर्थात सीखना औऱ सिखाने को प्रक्रिया ही शिक्षा है।सीखने औऱ सिखाने की प्रक्रिया में बहुत कुछ गहराई है।इस प्रक्रिया में दो केंद्र शिक्षार्थी औऱ शिक्षक न होकर तीन केंद्र हो जाते है,एक पाठ्यक्रम भी जुड़ जाता है।शिक्षा एक त्रिआयामी प्रक्रिया बन जाती है।यह त्रि-आयाम शिक्षा को पूर्णता प्रदान करता है।
भारतीय पवित्र ग्रन्थ "गीता" में शिक्षा के लिए लिखा है कि "सा विद्या विमुक्ते।"यानि विद्या(शिक्षा) वही जो बंधनो से मुक्त करे। शिक्षा जीवन की खुशहाली के मार्ग में आने वाली हर विपत्ति या मुश्किलों से मुकाबला करना सिखाती है।
भारतीय महान वि..
Posted By : Posted By seervi on 23 Aug 2019, 05:28:30
शिक्षा हम्हे अपनी मुश्किलों से आगे देखना सिखाती है : प्रस्तुति - पदमा चौधरी, JEN- सूरतगढ़

बढती हुई प्रतिस्पर्धा तथा वर्तमान परिस्थितियों की जटिलता को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा की शिक्षा एक मित्र की भाँती हमारा साथ देते हुए मुश्किलों से आगे देखना सिखाती है तथा विपरीत परिस्थितियों में भी हमारा मनोबल बढाकर मार्ग प्रशस्त करती है l बाल्यकाल से युवावस्था तक अर्जित शिक्षा रूपी धन एक गुरु की भाँती जीवन पर्यंत व्यक्ति का मार्गदर्शन करता है l
चाहे बाल्यकाल में माता की गोद में खेलते हुए स्वर व्यंजन का आलाप, चाहे विद्यालय में शिक्षको द्वारा हल करवाए गए गणित के प्रश्न, चाहे उच्च शिक्षा में विभिन्न विषयो का गहन अध्ययन आदि मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाते है तथा देनिक गतिविधियों को सरलता से निर्वाह करने की समझ देते है l
शिक्षा व्यक्ति में समझ, साहस, सृजनता, आत्मविश्वाश, सहिष्णुता, संबलता, वाकपटुता, तार्किकता, मोलिकता, सद्भावना आदि गुणों का संचार करती है तथा इसी के फलस्वरूप व्यक्ति में सकारात्मक दृष्टीकोण का उद्भव होता है जो मुश्किलों भरे इस स..
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