सीरवी समाज - ब्लॉग

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Posted By : Raju Seervi on 11 Dec 2020, 14:36:35
*सीरवी समाज में महिलायें सामाजिक स्तर पर जो सकारात्मक विचार धारा रखकर सामाजिक कार्य कर रही हैं, उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिये*

सीरवी समाज में महिलायें सामाजिक स्तर पर जो सकारात्मक विचार धारा रखकर सामाजिक कार्य कर रही हैं, उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिये। जिनका प्रयास सराहनीय है, उनके कार्य की प्रशंसा करना स्वार्थ सिद्धि नहीं, बल्कि सच्चाई को उजागर करना होता है। समाज में बढ़ती हुई द्वेष की भावना से प्रेरित प्रतिस्पर्धा को खत्म करना जरुरी हो गया है। सामाजिक स्तर पर व्यक्तिगत एवं सामूहिक द्वेष की भावना को भुलाकर एकजुट होकर समाज की उन्नति एवं उत्थान के लिये प्रयास करें। यह वक्त की माँग है। जैसे किसी भारी बोझ को उठाने के लिये दो हाथ की बजाय दस हाथ तथा दस हाथ के बजाय सौ हाथ सहायक होते हैं। उसी तरह सामाजिक कुरीतियों से दबे बोझ को उठाने के लिये सकारात्मक सोच भरे सौ हाथ जरुरी हैं।

सर्वप्रथम अपने मन में दबी हीनता की भावना को निकालकर दूर फेंकें। अपने में दबी प्रतिभा को उजागर करके, सामूहिक प्रयास से, समाज में फैली अज्ञानता की धूल को पोंछा डालें एवं नय..
Posted By : Posted By Manohar Seervi on 04 Dec 2020, 01:48:33
कोरोना की वेक्सीन हम ही

जैसे हर निखरती चीज सोना नहीं होता,,,,
वैसे हर खासी का मतलब कोरोना नहीं होता,,,,!
केवल जल्दी जल्दी में हाथ धोना,हाथ धोना नहीं होता,,,
30 सेकंड साबुन से हाथ धोने से कोरोना नहीं होता,,,,!
कोरोना वॉयरस का इलाज जादु टोना नहीं होता,,,,
साफ सफाई रखने से कोरोना नहीं होता,,,,!
कोरोना काल मे बस हमें सावधानी रखनी,,,,
मास्क, सेनेटाइजर, 2 गज की दूरी से कोरोना नहीं होता,,,,!
सावधानी रखना, जागरूकता रखने के बाद में रोना नहीं होता,,,
भीड़ भाड़ से दूर रहने से कोरोना नहीं होता,,,,!
लोगो से हाथ नहीं मिलाना,,,नमस्कार करने वालो को कोरोना नहीं होता,,,,!
समय रहते सचेत हो जाये तो अपनों को खोना नहीं होता,,,बीमार स्वयंम आइसोलेशन हो जाये तो अन्य लोगो को कोरोना नहीं होगा,,,,!!!

नितिन परिहार पुत्र चुतराराम
बेरा आसन की भडेट जेलवा बिलाड़ा
बीए बीएड
वर्तमान आरएएस अध्ययन्तर..
Posted By : Posted By Manohar Seervi on 03 Dec 2020, 05:45:27
श्री गणेशाय नमः
जय माता जी री मेरे समाज के सभी प्रिय बंधुओं पिता तुल्य बुजुर्गो और युवाओं मैं आपके समक्ष में मेरे अपने विचार रखने जा रहा हूं कृपया उस पर ध्यान दें और अपने जीवन में बदलाव के लिए अपनी समाज में बदलाव के लिए अपने समाज में विकास के लिए अपने समाज की प्रगति के लिए हमारे धर्म के विस्तार के लिए अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठ कर समाज के कल्याण के लिए दूरदर्शिता का परिचय देते हुए ध्यान देने की कृपा करें मैं एक सामान्य नागरिक क्षत्रिय खराडिया सीरवी समाज का बेटा आपका छोटा भाई आप सभी को जय माता जी री और आप सभी को मेरा दंडवत प्रणाम साहब हमें कुछ बड़ा करने का सोचना चाहिए जब हम कुछ सोचेंगे तो उसका असर अपने मन पर पड़ता है और मन का प्रभाव तन पर पड़ता है और तन और मन का प्रभाव अपने जीवन पर पड़ता है इसके लिए हमें अच्छी सोच रखनी चाहिए समाज के हर व्यक्ति को समाज के लिए कुछ करने का जज्बा रखना चाहिए यह हमारे समाजसेवी रामलाल जी सेणसा गांधीधाम वाले बा साहब ने कहा था वह मुझे बहुत ही अच्छा लगा इसके लिए यह यहां पर प्रयोग किया
*मेरी एक रिक्वेस्ट है कि हम सभी व्यापार करते ह..
Posted By : Posted By Manohar Seervi on 01 Dec 2020, 13:40:17
अपने सपने गैरो की वजह से टूटे

चाँद छिपा,सूरज ढला...
पग पग पर अरमान जगा...!
सपने टूटे गैरो की वजह से...
अरमान के नभ में निराशाओ के बादल ने घेरा...
न जाने कब होगा सवेरा...!
खोया सा रहता है दिन सारा...
जागी जागी रहती है रात...
सागर के लहरों की भांति...
छू छू कर फिर चली जाती है...
ऐसे मझधार में मेरी नैया फंसी...
गैरो की वजह से...!
जो सोचा था वो हो ना पाया...
सब सपने टूटे गैरो की वजह से...
वो अरमानों का हवाई महल
यही कही पर गिर गया...!
आखों में जो ख़्वाब दिखे...
आज वो दुसरो की वजह से ख़्वाब रह गए...
सब राहें सब सुनसान लगे...
अब मंजिल भी अनजान लगें...
मन रहता है तनहा तनहा...
सुना सुना लगता है जहान...!
टूट गया सपना मेरा...
बिखर गई आस मेरी...
आखो में सपने खो गए...
सब प्यास नजर आते है...!
अपने हुए पराये लेकिन...
गैर ना हो सके...
गैरो की बस्ती में कैसे अपनी नाव खड़ी...!!!


नितिन परिहार पुत्र चुतराराम जी
बेरा आसन की भडेट जेलवा बिलाड़ा
बीए बीएड
वर्तमान आरएएस अध्ययन्तर..
Posted By : Posted By Manohar Seervi on 01 Dec 2020, 12:06:32
आज के वर्तमान में इंटरनेट के माध्यम से ऑनलाइन का महत्व बहुत बढ़ गया है।

आज के वर्तमान में इंटरनेट का महत्व बहुत बढ़ गया है। वह अपनी जीवनशैली में काफी कुछ बदलाव ला रहा है। जैसे कि इंटरनेट की वजह से ऑनलाइन शॉपिंग, ऑनलाइन क्लासेज, ऑनलाइन बिजनेस,बैकींग,कुकींग फिर चाहे गेम रहो वगैरे काफी कुछ फायदा हो रहा है। समय के हिसाब से हम ऑनलाइन से काफी दूर थे। ऑनलाइन शॉपिंग वाले ऑनलाइन शॉपिंग करते थे हमें सिर्फ पता था पर अभी दुनिया में एवरी टाइम काम ऑनलाइन हो रहा है। आज के युग में छोटा से बड़ा तक इंटरनेट के माध्यम से ऑनलाइन का फायदा उठा रहे हैं। ऑनलाइन से हमको नए जमाने के साल 2020 इंटरनेट की शिक्षा देकर जा रहा है। बच्चों को ऑनलाइन क्या होता है यह भी पता नहीं था पर आज बच्चों से लगाकर बड़ो तक सब जानने लगे है ऑनलाइन के बारे में इंटरनेट के बारे में यह सब सीखा के गया है। यह एक अच्छा अनुभव सीखने को मिला जिससे काफी लोग इस अनुभव से वंचित थे। इस इंटरनेट की योग्यता का सबसे ज्यादा फायदा बच्चों को हुआ है।

आज के वर्तमान में हम देख रहे हैं कि कोरोना वायरस की वजह से हमारे जीवन में काफी क..
Posted By : Posted By गोविन्द सिंह पंवार on 07 Nov 2020, 05:19:29
मनोहर सीरवी (राठौड़) जनासनी-साँगावास (मैसूरु)
संपादक, सीरवी समाज डॉट कॉम www.Seervisamaj.com

मेरे प्यारे भाईयों एवं बहनों
सादर जय श्री आईमाताजी की।

सीरवी समाज डॉट कॉम वेबसाइट की और से आप सभी का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन है। इस माह नवम्बर में दीप पर्व दीपावली, भैया दूज के साथ-साथ कार्तिक पूर्णिमा के देव दीपावली पर्व पर आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें। जैसा कि आप जानते हैं कि दीपों का पर्व दीपावली अंधकार पर प्रकाश की जीत यानी बुराइयों पर अच्छाईयों की जीत के रूप में मनाया जाता है उसी प्रकार हम देवी श्रीलक्ष्मी जी एवं ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमारा सीरवी समाज भी बुराई रूपी अंधकार से बहार निकल कर देवव्यमान हो। समाजजनों के जीवन में खुशियाली हो तथा हमारा सीरवी समाज दिनों दिन प्रगति के सोपान पथ पर आगे बढ़ता हुआ अपनी छवि बिखरे।

आज समाज में शांति नहीं है। मेरा तो यह मानना है कि जीवन एवं समाज में शांति पहली आवश्यकता है। इसके बिना स्थिर मन से आप कोई काम नहीं कर सकते। इस संसार में कोई अजर-अमर नहीं है, इसलिए यह सोचना कि समाज हमारे मुठ्ठी में रहे, सही नह..
Posted By : Posted By गोविन्द सिंह पंवार on 26 Aug 2020, 01:13:22
मैसूरु के एक किराणा व्यवसायी मनोहर सीरवी का मानना है की जिस स्त्री का ध्यान मायके की तरफ विशेष हो समझ जाएं उस परिवार में महाभारत निश्चित है। बहुत लोगो का ये तक मानना है कि ज्यादातर तलाक का कारण भी लड़की के माता-पिता होते हैं। पर ये कहाँ तक सही है। मेरा मानना है कि लड़की के माँ बाप हो या लड़के के माँ बाप हो दोनो के अनावश्यक दखलअंदाजी के कारण घर बर्बाद होता है। ससुराल भी लड़की की मायके की तरह बन जाये तो महाभारत की नौबत ही नहीं आएगी। हर बात पर बेटे को बहकाना उसके कान भरना आज बहु ने मेरे साथ ऐसा किया। पति के जीवन मे भी अगर उसकी माँ की ज्यादा भूमिका होती है तो वो घर बिखर जाता है। सास हमेशा अपने बेटे बहु को अलग करने की कोशिश में लगी रहे । अगर सास अपनी बहू के साथ अच्छा व्यवहार करे तो बहू भी ऐसा ही करेगी। अगर ससुराल वाले हर बात पर बहु को टोके नही उसे खुलकर अपने तरीके से जीने दे । शादी के शुरुआत में पति पत्नी को एक दूसरे को समझने में समय लगता है पर सास का हर बात में दखल अंदाजी करना ये बहु को अच्छा नही लगता । और ज्यादातर सास को तो ये डर होता है कि कहीं मेरा बेटा जोरू का गुलाम न बन ज..
Posted By : Posted By Manohar Seervi on 27 Jul 2020, 11:53:11
मायड़ भाषा रा हैताळू
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मने म्हारी मायड़ भाषा मारवाड़ी बोली रो घणो है गुमान ।मनेआ बोले घणी चौखी लागे ।जिकी बोली में आपो अपणी मां सूं बात करां , जिकी बोली में आपणा सगळा संस्कार रेवे ,जिकी भाषा आपा रे रु रु में बसियोड़ी वे , वा मायड़ भाषा कैविजे ।आपाणी मायड़ भाषा राजस्थान री मारवाड़ी बोली घणी मीठी बोली है ।राजस्थान में घणी बोलियां बोली जावे ।कैवत है - तीन कोस पाणी पलटे बारह कोस बोली ।अपोणे मारवाड़ में भी १२कोस पछे लहजो बदळ जावे ।सबने आपरी बोली ने लहजो हकरो लागे ।अपाणी मारवाड़ी बोली सगळा मे फैलियोडी है ।जटे नी पूगी गाडी वटे भी पुगिया मारवाडी ।
आपा कमावण कारज मारवाड़ छोड परदेशा में बस गिया ।परदेश री बोली भाषा ने भी अपणे जरुरत रे मुजब सीखणी पडसी , बोलणो पडसी ।पण आपाने अपणी भाषा अरु संस्कृति ने नी भूलणो है ।केई मिनख आपरे मायड भाषा में बोलण सू शरम करे अरु विलायत री भाषा बोलण मे गरभ करे ।मायड भाषा बोलण वाळो ने गिंवार हमजे ।मायड भाषा रो निरादर करणो , मां बाप रो निरादर करणो सरीखो है ।जको आपरी भाषा तजे वाने केवे भांड , निज भाषो भाखता आवे जिणने लाज ।दे..
Posted By : Posted By Raju Seervi on 24 Jul 2020, 14:17:20
जन्म_क्या_है?

जन्म वह भावनाओं का सैलाब होता है जो किसी के पैदा होते ही पैदा होने वाले से जुड़े लोगों को अपने भावनाओं में बहा कर ले जाता है,जन्म वो एकमात्र दिन है जब आप पैदा हुए तो आपके रोने पे माँ मुस्कुराई थी उसके बाद सृष्टि ने वो दिन नहीं देखा जब आपके रोने पे माँ मुस्कुराई हो! जन्म सबका शायद किसी मकसद के लिए होता है? पर इस मकसद का हर किसी जन्म लेने वाले को पता ही नहीं होता शायद जन्म लेने वाले जन्म लेते हैं निर्भर हो जाते हैं जन्म देने वालों के ऊपर और तब तक निर्भर रहते हैं,जब तक वह खुद आत्मनिर्भरता की अवस्था में नहीं पहुंचते।

इस दुनिया के 99% लोग कभी यह नहीं सोच पाते कि तुम्हारा जन्म किस लिए हुआ है तुम किस मकसद से इस दुनिया में आए हो और किन कारणों से तुम्हारा जन्म सिद्ध होगा या तुम्हारा जन्म लेना सफल होगा? जन्म देकर किसी के जन्म को सफल करने वाली जननी कि प्रसव पीड़ा के दौरान उस का घुटता हुआ दम टूटती हुई सांसे शायद किसी मकसद के लिए किसी को जन्म देते समय जद्दोजहद कर रही होती हैं! और एक नन्ही सी किलकारी के साथ रोने की आवाज के साथ अपनी उखड़ी हुई सांसे भूल वह जननी न..
Posted By : Posted By Manohar Seervi on 17 Jun 2020, 10:38:42
किसी ने खूब कहा कि एक क्रांति की शुरुआत खुद के घर से होती हैं खुद से होती हैं । चलो सबसे पहले मैं ही बहिष्कार करता हूं
" मैं दुर्गाराम सीरवी यह शपथ लेता हूँ कि मैं किसी भी प्रकार का चाइना के समान नहीं खरीदूंगा।"
कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना जैसे-
" आपके पास फोन भी चाइना का है "
"आपके घर में चाइना के सामान है "
" आम आदमी ही क्यो बहिष्कार करे। "
"सरकारे कब करेंगी "
ऐसी हजारों बातों को भारतीय सेना के सम्मान में एक तरफ रख दीजिए।सेना सर्वोपरि ही हमारी।
अरे ! भाई हमे किसी से कोई मतलब नही है।
हमे खुद से शुरुआत करनी है बाकी का काम स्वत: ही होगा।
एक बात बताओ," भारतीय सेना का जवान हमारी भारतीय सीमा की रक्षा करते हुए शहीद हुए हैं भाई। भारत माता की सेवा करते हुए सेना के जवान इतना नही सोचते भाई तो हम चीनी सामानों का बहिष्कार करने में क्यों सोचें।

देखो भाई "भारतीय सेना के वीर जवानो को सच्ची श्रद्धांजलि देनी हैं मुझे,मैंने तो शुरुआत कर दी हैं।"

।। जय हिद। वंदेमातरम ।।
प्रस्तुति :- दुर्गाराम सीरवी कोयम्बटूर तमिलनाडु..
Posted By : Posted By Manohar Seervi on 17 Jun 2020, 06:28:08
संस्कृति की सौरभ---
हम नारियल क्यों अर्पित करते हैं?
भारतीय संस्कृति में मंदिर के लिए सबसे लोकप्रिय भेंट 'नारियल 'है।देवी-देवताओं की पूजा-स्तुति करने के लिए नैवेद्य के साथ नारियल चढ़ाने की भी परम्परा है।विवाह और पर्वों पर,नयी गाङी,घर-मकान,सङक,पुल ,दुकान का उपयोग करने से पूर्व भी नारियल भेंट किया जाता है। जल से भरा एक कलश लेकर उस पर आम के पत्ते सजाये जाते है और उस पर एक नारियल रखा जाता है ।इससे महत्वपूर्ण अवसरों,पर्व-उत्सवों पर पूजा भी की जाती है ।नारियल (श्री फल)भेंट कर साधु-संतों और अतिथियों का बहुमान भी किया जाता है ।भगवान को प्रसन्न करने या अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हवन करते समय यज्ञ की अग्नि में भी नारियल को अर्पित किया जाता हैऔर नारियल को फोङा जाता है तथा भगवान के सामने रखा जाता है ।जिसे बाद में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है ।सूखे नारियल के ऊपर के गुच्छे को छोड़कर,उसका रेशा उतार दिया जाता है ।नारियल के ऊपर के निशान एक प्राणी के सिर जैसे दिखाई देते है ।नारियल फोङना अहं को समाप्त करने का प्रतीक है ।अन्दर का रस जो हमारी वासनाओं का प्रतीक ..
Posted By : गोविन्द पंवारon 17 Jun 2020, 05:09:50
जब हम किसी और से संपर्क साधते हैं तो इस बात की आशा करते हैं कि वह अच्छा आचरण करें। यह जरूरी नहीं कि मुक्के का जवाब मुक्का ही हो। अच्छा आचरण वह है जिसमें बुरी स्थितियों को अच्छे एवं सुन्दर तरीके से पेश किया जाए। दूसरों से हम कैसा व्यवहार करते हैं चाहे स्थिति विपरीत ही क्यों न हो, हमें उत्तेजित या शान्त, भ्रष्ट या ईमानदार, बर्बर या सभ्य बना सकता है। अच्छी आदतें, अच्छे मित्रों की तरह होती हैं जो आपको ऐसी स्थिति में ले जाते हैं, अन्य गुण यदि आपका आचरण अच्छा है यह तुरन्त दृष्टिगोचर हो जाता है। सभ्य होने का कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता अलबत्ता यह आपको कुछ प्राप्त करवाता है। यह बात श्ांका से परे है कि हम सभी में किसी न किसी गुण की कमी होती है, और इसी कारण ज्ञान का गुणगान करते हैं और इसके महत्व को समझते हैं। सद्गुणों की सबसे मौलिक बात जो हम सभी नहीं अपनाते हैं वह है इसका निरन्तर अभ्यास करना। इन सद्गुणों से ही हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हर चीज सही ढंग से हो और हमें दूसरों की राय भी मिले। दयालुता एवं दूसरों के बारे में सोचने जैसे सद्गुणों को छोड़कर उस चीज में लगातार ..
Posted By : गोविन्द पंवार on 16 Jun 2020, 04:03:47
रिश्तों के तानेबाने की मजबूत डोर 'परिवार'

हर इंसान के जीवन की पहली पाठशाला परिवार को ही कहा जाता है। परिवार जो अपनों के साथ और संबल का ठिकाना होता है। जहां एक ही छत के नीचे रहकर सुख-दुख साझा करते हुए जीवन जीया जाता है। परिवार में ही किसी समाज के भावी नागरिक इंसानियत का पाठ पढ़ते हैं। जिंदगी का हर वो सबक इसी आंगन में मिलता है, जो आगे चलकर बच्चों को संपूर्ण व्यक्तित्व का धनी बनाता है तो बड़ों को संभाल और देखभाल का आधार देता है। परिवार और उसमें मौजूद आपसी जुड़ाव एक मजबूत पृष्ठभूमि-सा है, जो हमें हर परिस्थिति में जीने का हौसला देता है। परिवार पूरे समाज को आधार देता है। जिसकी नींव पर हम सबका जीवन टिका होता है।

खुशियों और जिम्मेदारियों का मेल

पारिवारिक व्यवस्था सही मायनों में हमारे जीवन का आधार स्तंभ है। सामाजिक जीवन में साथ रहने का अर्थ होता है सुख-दुख साझा करने की सोच, अपनेपन का पाठ और दिलों का मेल। हमारे यहां हर तबके के परिवार में यह सोच देखने-जानने को मिलती है। हर तरह से एक-दूसरे के साथ समन्वय और सहयोग भरा भाव ही पारिवारिक संबंधों का संबल होता है। परि..
Posted By : Raju Seervi on 15 Jun 2020, 14:26:43
सब कुछ बदल गया

कहां खो गए वो जीवन के पल
वो जीवन की रंगीनियां
देखते निहारते तितलियां
मिलते मुस्कुराते दिन कट जाते थे
अब दिलोदिमाग में…
कोई नहीं रहता !!
मानो सब कुछ बदल गया है!!
दस्तकें होती रहती हैं, लेकिन
अब दिल शांत रहता है
थी उत्साह और उमंगे
जीवन की धारा
अब खामोश सी
मानों वृक्ष के ठूँठ सी हो गयी है

मेरे दिलो-दिमाग में अब कोई नहीं रहता !!
मानों सब कुछ बदल गया है!!
खामोशी वहां रहती है,
जहाँ लगती थी महफिलें
ठहाके लगते थे जहां
अब वो इमारतें बनी खंडहरें सुनसान है
मेरे दिलोदिमाग में अब कोई नहीं रहता !!
मानो सब कुछ बदल गया है!!
दीवारों पे जाले हैं बैठी धूल की परतें है
यादें बनी धुंधली है…
कब तक महफिलों के संग रह पाता
हम बैठे रह गए, महफ़िल उठ चली गयी
मेरे दिलोदिमाग में अब कोई नहीं रहता
मानों सब कुछ बदल गया है!!
अँधेरे ही अँधेरे अब दिखने लगे हैं,
महफिलों का साथ छूटा अब
तो आहटों से भी डरने लगे हैं
कभी सूर्य से आंखें मिलाते थे
अब अंधेरों से भी भय होने लगा है
मेरे दिलोदिमाग में अब कोई नहीं रहता !!
मेरे दिल में…
अब कोई नहीं रहता <..
Posted By : Manohar Seervi on 12 Jun 2020, 10:56:29
हम मंदिर में घन्टी (टंकोर)क्यों बजाते हैं?
अक्सर छोटे बङे सभी मंदिरों में प्रवेश द्वार के पास ऊँचाई पर एक या अधिक घंटियाॅ (टंकोर)लटकी रहती हैं ।मन में श्रद्धा-भक्ति और आस्था का भाव लेकर श्रद्धालु मंदिर-प्रवेश करते ही घंटी (टंकोर) बजाता है और फिर भगवान के दर्शन,पूजा-पाठ और प्रार्थना स्तुति के लिए आगे बढ़ता है ।साथ में आए छोटे बच्चों को उछलकर या ऊपर उठाए जाने के पश्चात् घंटी बजाकर खूब आनंद मिलता है ।आखिर हम घंटी क्यों बजाते हैं?क्या यह भगवान को जगाने के लिए है?परन्तु भगवान तो कभी सोते नहीं ।क्या इससे हम भगवान को अपने आने की सूचना देते हैं?उनको यह बताने की आवश्यकता नहीं,क्योंकि वे तो सर्वज्ञ है ।तो क्या यह भगवान के क्षेत्र में जाने की अनुमति लेने का एक ढंग है?यह तो अपने ही घर में आना है,जिसके लिए प्रवेश की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं ।भगवान तो हर समय सदा हमारा स्वागत करते हैं ।फिर हम घंटी क्यों बजाते हैं? घंटी बजाने से जो ध्वनि निकलती है,वह शुभ समझी जाती है ।यह ऊँकी ध्वनि उत्पन्न करती है,जो ईश्वर का सर्व व्यापक नाम है ।भगवान सर्व-मंगलकारी है ।इस सूक्ष्म दृष..
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