सीरवी समाज - ब्लॉग

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Posted By : Posted By seervi on 03 Sep 2019, 06:06:11
सीरवी समाज की अच्छाइयां सबसे जुदा -------------------------------------------
सीर कियो जद सीरवी सो जाणे संसार ,सीरवी समाज बहुत ही सरल ,सुलझी हुई व शांति प्रिय कौम है!आपस में हिलमिल कर रहना ,सादा जीवन उच्च विचार ,चाहे खेती हो या व्यापार अपनी मेहनत व हूनर के बल पर बनाई है अपनी अलग पहचान ! सेवाभाव,मेहनतकश व ईमानदारी इस समाज की अच्छी खूबियां है ,लेकिन जो सबसे अच्छी खूबी है वह है परिस्थिति के अनुसार सामंजस्य-चाहे शादी ब्याह का समारोह हो या फिर कोई अन्य फंक्शन उनमें लोग अपनी हैसियत के अनुसार सम्पन्न कर लेते है तो उसमें कोई शिकवा शिकायत नहीं करते हैं!विवाह की रस्में बड़े ही सादगीपूर्ण ढंग से सम्पन्न कर दी जाती है,सामने वाले समधी यानि वरपक्ष की ओर से कोई विशेष डिमांड नहीं होती है!जब कि अन्य कौमो छोटी मोटी जातियों में हम अक्सर देखते है कि इन अवसरों पर अजीब अजीब मांगे रख दी जाती है जो मजबूरी में लड़की के पिता को हैसियत न होते हुए भी पूरी करनी पड़ती है!ऐसा खाना होना चाहिए ,बारातियों का स्वागत ऐसा होना चाहिए,दुल्हें के लिये व और भी फलाना ठीमका तरह तरह की अजीबोगरीब मांगे रख देते है जो पूरी न ह..
Posted By : Posted By seervi on 30 Aug 2019, 05:05:16
इन्फॉर्मेशन और बदलाव:

मानव जीवन की एक अभिलाषा रही है ज्ञान अर्जित करना , ज्ञान यानी नॉलेज जानकारी गर्भसार...


ज्ञान विषय वस्तु की वो जड़ जो हमें सत्य से मुलाकात करवाती है....

बात कर रहे है ज्ञान की..
इन्फॉर्मेशन आते ही हमारे अंदर परिवर्तन आने शुरू हो जाते हैं जो जटिल केमिकल का निर्माण करते हैं....

मतलब ज्ञान (इन्फॉर्मेशन) आने के साथ हमारे शरीर में परिवर्तन आते है। परिवर्तन निर्माण करते है क्या सोचते हैं वो बनाने में। यह कैसे होता है इसे एक उदाहरण से समझते हैं -

मान लीजिए की आप को कहा जाए आप सपने में भाग रहे है और आपके पीछे शेर पडा हुआ है। एक लपक और आपकी मृत्यु (वैसे सपने में कोई भी अपने आप को मरता हुआ नहीं देख सकता) निकट , फटाक से आपकी नींद खुल जाती हैऔर आप महसूस करते हैं पैर थके हुए सर पर पसीना ब्लड प्रेशर हाई।

भौतिक रूप से देखें तो आप के साथ ऐसा कुछ हुआ नहीं , तो फिर शरीर में आए बदलाव किसने किए ?

वो आपकी इन्फॉर्मेशन है....

ज्ञान सकारात्मक हो सकता है नकारात्मक भी...
पर बदलाव होते है ज्ञान से..

उस बदलाव से आपका व्यवहार निश्..
Posted By : Posted By seervi on 29 Aug 2019, 07:44:55
देश का बटवारा हुआ, सबने अपने अपने हिसाब से माँगा, खोया, पाया l
प्रकृति ने हमारा पलायन किया, हमने भी माँगा, खोया और पाया l

क्या खोया और क्या पाया शायद इस लेख से समझ आये - मुझे तो आया l
सिंध का बंटवारा पंजाब और बंगाल से अलग है !

सिंध को हमसे बिछड़े 70 बरस हुए !
सिंधियों की जो पीढ़ी बंटवारे के दौरान इस पार आई थी
उनमें से ज्यादातर अब इस दुनिया में नहीं हैं .
बचे-खुचे कुछ बूढ़ों की धुंधली यादों के सिवा अब सिंध सिर्फ हमारे राष्ट्रगान में रह गया है .
इन 70 सालों में हमें यह एहसास ही नहीं हुआ
कि हमने सिंध को खो दिया है .
इस बीच सिंधियों की दो पीढ़ियां आ गई है
पर सिंध और सिंधियों के पलायन के बारे में हम अब भी ज्यादा कुछ नहीं जानते .

बंटवारे का सबसे ज्यादा असर जिन तीन कौमों पर पड़ा
उनमें पंजाबी ,बंगाली और सिंधी थे .
मगर बंटवारे का सारा साहित्य फिल्में और तस्वीरें पंजाब और बंगाल की कहानियां से भरी है .
मंटो के अफसानों से भीष्म साहनी की 'तमस' तक बंटवारे के साहित्य मे पंजाब और बंगाल की कहानियां हैं .
सिंध उनमें कहीं नहीं है.
पंजाबी और बंगालियों के मुकाब..
Posted By : Posted By seervi on 29 Aug 2019, 04:59:30
जब में लिखने बैठता हु, सोचने बैठता हु की क्या लिखू - तब सबसे पहले मेरे मन में ख़याल आता है की मेरे लेखन का दायरा कितना होना चाहिए l सीरवी समाज के आदरणीय गणमान्य नागरिको हर सोच का एक दायरा होता है, आजकल हम सोशल मीडिया पर विभिन्न तरीके के विचारो से रूबरू होते है, प्रत्येक विचार को जब हम पढ़ते है तब हम उसे मन ही मन अपने दायरे में समाहित कर के समझने की कोशिश करते है, प्रत्येक विचार अपने समझने वाले को अलग अलग मानसिकता से ग्रसित करता है, इसमें उस विचार की मूल अवधारण भी कभी कभी गायब हो जाती है, क्यूंकि पाठक की मानसिकता उस विचार में वही देखती है जो वह देखना चाहती है l अर्थार्थ सभी का अपना अपना एक सही होता है और उसी मुताबिक़ मानसिकता भी होती हैहर द्रश्य या लिखित उसी मानसिकता के प्रभाव को इंगित करते हुए समझने में आती है l
मेरे परम मित्र श्री हीराराम गहलोत जो की पेशे से अध्यापक है शिक्षाविद है के द्वारा अभी हाल ही में एक बहुत ही प्रेरणादायक लेख सामने आया है जिसके अनुसार यह चिंता जाहिर की गयी है की "आखिर हमारी यह सोच कब बदलेगी? क्या हम ऐसी घटिया मानसिकता से समाज का उत्थान कर पा..
Posted By : Posted By seervi on 28 Aug 2019, 03:10:57
शिक्षा हमे अपनी मुश्किलों से आगे देखना सिखाती हैं

शिक्षा का मुलभुत महत्व व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास में निहित हैं , और जहा विकास के पथ गमन की बात हो चुनोतिया और मुश्किलें रूपी रुकावते ठोकर के रूप में जरूर आती हैं ; शिक्षा प्राप्त व्यक्ति इन ठोकरों को कैसे पार करना या कैसे बचना हैं उसको समझता ही नहीं बल्कि दूसरो के लिए भी वो ठोकर से बचने का मार्गदर्शन करता हैं !

आदिकाल से अभी तक किये गए अविष्कारों में शिक्षा ही केंद्र रही हैं जिसने नित नए प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया और मानव को जंगलो से निकाल कर उसको मोहन जोदड़ो समृद्ध सभ्यता से भी आगे स्मार्ट सिटी में रहने तक का सफर दिखवाया ! पुराने ज़माने की दैनिक जीवन की कठिनाओ को हम शिक्षा रूपी कुल्हाड़ी से काट पाए और जीवन में नए चीजों की तरफ देख पाए | यह क्रम शिक्षा के उद्गमन से निरंतरता लिए हुए हैं !

शिक्षा से हम क्या प्राप्त करते हैं ? समग्र बुद्धि ! जो की चेतना देती हैं और चेतना से ही अपने आस पास के आवरण की आभा महसूस होती हैं , इसी आभास से उचित निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि होती हैं और इस प्रकार लिया गय..
Posted By : Posted By seervi on 25 Aug 2019, 13:16:32
शिक्षा का महत्व सदियों पुराना है । शिक्षा ग्रहण करना यानि अपने आप को निखारना । अपनी कुशाग्रता बढाना , चंचलता बढाना होता है । शिक्षा ग्रहण करने से हम सामाजिक साहित्यों का अध्ययन कर सकते है, लेखाजोखा रख सकते है, लेनदेन का सही हिसाब रख सकते है और भी अनगिनत फायदे है , कहते भी है और सत्य भी है कि पढेलिखे को चार आंखें होती है ।
भारतीय संविधानानुसार हर एक को शिक्षा देना हमारा कर्तव्य है और शिक्षा ग्रहण करना हर बालक का अधिकार है और यह फर्ज हमे पुरा करने का अवश्य प्रयत्न करना ही चाहिए । उसके साथ साथ हमे अपने बच्चों को धार्मिक , मानवीय शिक्षाओं से भी रूबरु करवाना चाहिए । जहां विद्यालयीन शिक्षा उसे पढना लिखना सिखाती है , वहीं धार्मिक, और मानवीय शिक्षा उसे संस्कारों के प्रति जागरूक करती है, आडंबरों व अंधविश्वासों से दूर करती है , अपने आप को वैचारिक मजबूती मिलती हैं। और भी अनगिनत लाभ है शिक्षा पाने के ।
हमे यह सबसे पहले सोचना है कि बच्चों को मातृभाषा मे दी जानेवाली शिक्षा सबसे ज्यादा असरदायक रहती है , अपनत्व रहता है , अन्य भाषाओं की सिखावट की तरह उसको अपनी मातृ..
Posted By : Posted By seervi on 25 Aug 2019, 04:02:17
हमारे यहाँ एक दिक्कत है हम अपने आप को छोड़कर दुसरो को सपोर्ट करने में विश्वास रखते है, जबकि अगर आप अपने आप को जबतक सक्षम नहीं बनाएंगे तब तक आप कैसे किसी की सहायता कर पाएंगे। अगर मैं भटक जाउंगा तो आप क्या करेंगे, सवाल करेंगे या नहीं। यही हम गलत हो जाते है। अगर हम भटक गए तो आप पहले समझिये अच्छी बात है लेकिन आप जबतक मुझसे सवाल नहीं करेंगे तबतक मुझे अपनी गलती का एहसास नहीं होगा। जब आप पूछेंगे तो मैं सोचूंगा ना उससे पहले तक तो मुझे पता है मैं सही हूँ। क्योंकि किसी ने अभी तक सवाल नहीं किया, हम पहले अपने अंदर गलती ढूंढने लगते है। क्योंकि जहाँ आपने यह सोचा की समझने का प्रयत्न करेंगे वही आप उसके प्रति सही सोचने लगे, की वह सही हो सकता है।

जबतक आप पूछेंगे नहीं उसको सही गलत का फर्क पता नहीं चलेगा, अगर आप पूछेंगे तो आपको जवाब मिलेगा। हो सकता है वह सही हो लेकिन उसको अभी तक सोचने का मौका ही नहीं मिला। क्योंकि आपने ऊँगली उठाई तो उसको सोचने का मौका मिलेगा। जब सवाल जवाब होता है तो एक भावार्थ निकल कर आता है जिससे पता चलता है क्या सही है क्या गलत, हो सकता है आपने सवाल किया वह गलत ह..
Posted By : Posted By seervi on 24 Aug 2019, 04:27:58
"पापा जी ! पंचायत इकठ्ठी हो गई , अब बँटवारा कर दो।" कृपाशंकर जी के बड़े लड़के गिरीश ने रूखे लहजे में कहा।

"हाँ पापा जी ! कर दो बँटवारा अब इकठ्ठे नहीं रहा जाता" छोटे लड़के कुनाल ने भी उसी लहजे में कहा।

पंचायत बैठ चुकी थी, सब इकट्ठा थे।

कृपाशंकर जी भी पहुँचे।

"जब साथ में निर्वाह न हो तो औलाद को अलग कर देना ही ठीक है , अब यह बताओ तुम किस बेटे के साथ रहोगे ?" सरपंच ने कृपाशंकर जी के कन्धे पर हाथ रख कर के पूछा।

कृपाशंकर जी सोच में शायद सुननें की बजाय कुछ सोच रहे थे। सोचने लगे वो दिन जब इन्ही गिरीश और कुनाल की किलकारियों के बगैर एक पल भी नहीं रह पाते थे। वे बच्चे अब बहुत बड़े हो गये थे।

अचानक गिरीश की बात पर ध्यानभंग हुआ,

"अरे इसमें क्या पूछना, छ: महीने पापा जी मेरे साथ रहेंगे और छ: महीने छोटे के पास रहेंगे।"

"चलो तुम्हारा तो फैसला हो गया, अब करें जायदाद का बँटवारा ???" सरपंच बोला।

कृपाशंकर जी जो काफी देर से सिर झुकाए सोच मे बैठे थे, एकदम उठ के खड़े हो गये और क्रोध से आंखें तरेर के बोले,

"अबे ओये सरपंच, कैसा फैसला हो गया ? अब मैं करूंगा फैसला, इन दोनों लड़कों को ..
Posted By : Posted By seervi on 24 Aug 2019, 03:48:35
शीर्षक:-बिन पुरुषार्थ सफलता कहाँ?

किसी कवि ने क्या खूब लिखा है कि
"बिना काम के मुकाम कैसा?
बिना मेहनत के,दाम कैसा?
जब तक ना हासिल हो मंजिल,
तो राह में,राही आराम कैसा?
यह हर उस व्यक्ति के लिए सफलता का बड़ा मूलमंत्र है जो पुरुषार्थ को साथ लेकर ढृढ इरादों से मंजिल की धुन में आगे बढ़ते रहते है।ऐसे व्यक्ति ही जीवन मे सफलता को अर्जित करते है औऱ वे अपने सपने को साकार कर जाते है।
विश्व के महान दार्शनिक औऱ विचारक सुकरात ने कहा था कि,"सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति वह है,जो प्रगति के लिए सर्वश्रेष्ठ परिश्रम करता है।" जो व्यक्ति सफलता पाने का इच्छुक होते है और हर हाल में सफलता पाने के लिए कठोर परिश्रम करता है।वे अपने निहित लक्ष्य को पाने के लिए तनिक भी विश्राम नही करते है और न ही अपने लक्ष्य को निगाहों से ओझल होने देते है।ऐसे व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंचते है। पुरुषार्थी व्यक्ति दृढ़ इरादों के धनी होते है,वे समय को नियोजित कर पुरुषार्थ करते है।ऐसे व्यक्ति सकारात्मक विचारधारा के साथ आगे बढ़ते है।वे अपने जीवन मे असफल हो भी जाते है तो निराश नही होते है।वे सतत अपने को इस ..
Posted By : Posted By seervi on 24 Aug 2019, 03:46:52
निबंध:-शिक्षा हमें अपनी मुश्किलों से आगे देखना सिखाती है।
शिक्षा एक प्रकाश का वह स्रोत है जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हमारा सच्चा पथ प्रदर्शक करती है।शिक्षा हमें अज्ञानता से बाहर निकालती है।शिक्षा अंधेरे से उजाले की ओर ले जाती है।हम सब शिक्षा की महत्ता जानते है।शिक्षा एक दिव्य प्रकाश पुंज है जिससे सर्वत्र उजियारा ही उजियारा होता है।
शिक्षा शब्द संस्कृत के 'शिक्ष' धातु से बना है जिसका अर्थ है -सीखना औऱ सिखाना। अर्थात सीखना औऱ सिखाने को प्रक्रिया ही शिक्षा है।सीखने औऱ सिखाने की प्रक्रिया में बहुत कुछ गहराई है।इस प्रक्रिया में दो केंद्र शिक्षार्थी औऱ शिक्षक न होकर तीन केंद्र हो जाते है,एक पाठ्यक्रम भी जुड़ जाता है।शिक्षा एक त्रिआयामी प्रक्रिया बन जाती है।यह त्रि-आयाम शिक्षा को पूर्णता प्रदान करता है।
भारतीय पवित्र ग्रन्थ "गीता" में शिक्षा के लिए लिखा है कि "सा विद्या विमुक्ते।"यानि विद्या(शिक्षा) वही जो बंधनो से मुक्त करे। शिक्षा जीवन की खुशहाली के मार्ग में आने वाली हर विपत्ति या मुश्किलों से मुकाबला करना सिखाती है।
भारतीय महान वि..
Posted By : Posted By seervi on 23 Aug 2019, 05:28:30
शिक्षा हम्हे अपनी मुश्किलों से आगे देखना सिखाती है : प्रस्तुति - पदमा चौधरी, JEN- सूरतगढ़

बढती हुई प्रतिस्पर्धा तथा वर्तमान परिस्थितियों की जटिलता को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा की शिक्षा एक मित्र की भाँती हमारा साथ देते हुए मुश्किलों से आगे देखना सिखाती है तथा विपरीत परिस्थितियों में भी हमारा मनोबल बढाकर मार्ग प्रशस्त करती है l बाल्यकाल से युवावस्था तक अर्जित शिक्षा रूपी धन एक गुरु की भाँती जीवन पर्यंत व्यक्ति का मार्गदर्शन करता है l
चाहे बाल्यकाल में माता की गोद में खेलते हुए स्वर व्यंजन का आलाप, चाहे विद्यालय में शिक्षको द्वारा हल करवाए गए गणित के प्रश्न, चाहे उच्च शिक्षा में विभिन्न विषयो का गहन अध्ययन आदि मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाते है तथा देनिक गतिविधियों को सरलता से निर्वाह करने की समझ देते है l
शिक्षा व्यक्ति में समझ, साहस, सृजनता, आत्मविश्वाश, सहिष्णुता, संबलता, वाकपटुता, तार्किकता, मोलिकता, सद्भावना आदि गुणों का संचार करती है तथा इसी के फलस्वरूप व्यक्ति में सकारात्मक दृष्टीकोण का उद्भव होता है जो मुश्किलों भरे इस स..
Posted By : Posted By seervi on 20 Aug 2019, 04:28:06
नमस्कार .. शुभ प्रभात ... मित्रो ... बंधुओ ... सदस्यों
सत्यम शिवम् सुन्दरम - सोशल मीडिया सीरवी सामाजिक विचारको का मंच

विगत कुछ हफ्तों से सोशल मीडिया पर विभिन्न माध्यमो पर प्रसारित सीरवी युवाओं की वार्ताओं, फेसबुक कमेंट और पोस्ट पर एक सरसरी निगाह डालने के पश्चात एक राय जेहन में उभरी है, आपके समक्ष पेश है -

कोई पांच छ: साल पहले की बात है, तब इन्टरनेट का विस्तार और स्मार्ट फोन की उपलब्धता इतनी व्यापक नहीं थी, बेल्लारी वाले राज राठोर के अनुसार तब ऑरकुट का ज़माना था, और मीडिया में सीरवी समाज के  पत्रकार के रूप में मंगल सेनचा का अपना एक प्रभाव था, सामयिक और समसामयिक घटनाओं और समाज के विभिन्न गुटों संघठनो संस्थाओं पर उनकी पेनी नजर रहती थी, उस समय सामान्य बाजार भी काफी तेज थे, आम आदमी के पास सोशल मीडिया के लिए समय भी नहीं था - मैं बात कर रहा हु उस समय की - जब फेसबुक और व्हाट्स अप्प पर विभिन्न तरह के अभिवादन और उस से जुड़े फोटो विडियो मेसेज का प्रसारण बहुतायत से लोग करते थे, सोशल मीडिया पर इक्की दुक्की जगह पर अपने सामाजिक विचारो को रखने वाले कुछ सीरवी  बंधू जैसे स्व. मंग..
Posted By : Posted By seervi on 19 Aug 2019, 07:05:41
सोशल मीडिया के महत्व को समझे सीरवी समाज अनमोल अवसर यूं न गवाएं

वर्तमान समय में सोशल मीडिया सूचनाओं को आसानी से आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसकी व्यापकता और कम समय में अधिक से अधिक लोगों तक जरुरी सूचनाएँ पहुंचाने की क्षमता तमाम लोगों के लिए बेहद सुविधाजनक है वहीं दूसरी तरफ उन्माद फैलाने वाले कुछ लोग इसका दुरुपयोग भी कर रहे हैं।

कुछ महीनों पहले मैं इलैक्ट्रॉनिक मिडिया तन्त्र से अनजान थी किताबों में ही ज्यादा व्यस्त रहती थी लेकिन अब इलैक्ट्रॉनिक मिडिया संसार के बारे मे थोड़ा जानने लगी हूँ, समाज का अपना कोई मीडिया नहीं था। समाज विकास के सम्बन्ध मे अपने विचार र्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाना तो दूर... एक ही गांव में संवाद चिंतन तक नहीं हो पाता था।

मिशन के कुछ जुनूनी लोग अपना सुख छोड़, सामाज में पत्रिका का कार्य करते रहे, लेकिन समाज ने उनको सहयोग......रहा अब सोशल मीडिया की क्रांति ने हमें अपने समाज की सामाजिक वैचारिक जागृति मे परिवर्तन के लिए अनमोल मंच मिला है, जैसे "सीरवी समाज सम्पूर्ण भारत डॉट कॉम" हमारे समाज का एक बेहतरीन प्लेटफार..
Posted By : Posted By seervi on 14 Aug 2019, 06:09:35
विवाह की बढ़ती उम्र पर खामोशी क्यों...?
30-35 साल की युवक युवतियां बैठे है कुंवारे, फिर मौन क्यों हैं समाज के कर्ता-धर्ता
कुंवारे बैठे लड़के लड़कियों की एक गंभीर समस्या आज कमोबेश सभी समाजों में उभर के सामने आ रही है। इसमें लिंगानुपात तो एक कारण है ही मगर समस्या अब इससे भी कहीं आगे बढ़ गई है। क्योंकि 30 से 35 साल तक की लड़कियां भी कुंवारी बैठी हुई है। इससे स्पष्ट है कि इस समस्या का लिंगानुपात ही एकमात्र कारण नहीं बचा है। ऐसे में लड़के लड़कियों के जवां होते सपनों पर न तो किसी समाज के कर्ता-धर्ताओं की नजर है और न ही किसी रिश्तेदार और सगे संबंधियों की। हमारी सोच कि हमें क्या मतलब है में उलझ कर रह गई है। बेशक यह सच किसी को कड़वा लग सकता है लेकिन हर समाज की हकीकत यही है, 25 वर्ष के बाद लड़कियां ससुराल के माहौल में ढल नहीं पाती है, क्योंकि उनकी आदतें पक्की और मजबूत हो जाती हैं अब उन्हें मोड़ा या झुकाया नहीं जा सकता जिस कारण घर में बहस, वाद विवाद, तलाक होता हैं बच्चे सिजेरियन ऑपरेशन से होते हैं जिस कारण बाद में बहुत सी बिमारी का सामना करना पड़ता है ।
शादी के लिए लड़की की उम्र 18 साल व ल..
Posted By : Posted By seervi on 14 Aug 2019, 06:07:36
समस्या - *"बेटा, मेरी बहुएं मेरा कहना नहीं सुनती। सलवार सूट और जीन्स पहन के घूमती हैं। सर पर पल्ला/चुनरी नहीं रखती और मार्किट चली जाती हैं। मार्गदर्शन करो कि कैसे इन्हें वश में करूँ..."*

*समाधान* - आंटी जी चरण स्पर्श, पहले एक कहानी सुनते हैं, फिर समस्या का समाधान सुनाते हैं।

"एक अंधे दम्पत्ति को बड़ी परेशानी होती, जब अंधी खाना बनाती तो कुत्ता आकर खा जाता। रोटियां कम पड़ जाती। तब अंधे को एक समझदार व्यक्ति ने आइडिया दिया कि तुम डंडा लेकर दरवाजे पर थोड़ी थोड़ी देर में फटकते रहना, जब तक अंधी रोटी बनाये। अब कुत्ता *तुम्हारे हाथ मे डंडा देखेगा और डंडे की खटखट सुनेगा तो स्वतः डर के भाग जाएगा रोटियां सुरक्षित रहेंगी*। युक्ति काम कर गयी, अंधे दम्पत्ति खुश हो गए।

कुछ वर्षों बाद दोनों के घर मे सुंदर पुत्र हुआ, जिसके आंखे थी और स्वस्थ था। उसे पढ़ा लिखाकर बड़ा किया। उसकी शादी हुई और बहू आयी। बहु जैसे ही रोटियां बनाने लगी तो लड़के ने डंडा लेकर दरवाजे पर खटखट करने लगा। बहु ने पूँछा ये क्या कर रहे हो और क्यों? तो लड़के ने बताया ये हमारे घर की परम्परा है, मेरी माता जब भी रोटी बनाती..
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