सीरवी समाज - ब्लॉग

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Posted By : Posted By Manohar Seervi on 17 Jun 2020, 10:38:42
किसी ने खूब कहा कि एक क्रांति की शुरुआत खुद के घर से होती हैं खुद से होती हैं । चलो सबसे पहले मैं ही बहिष्कार करता हूं
" मैं दुर्गाराम सीरवी यह शपथ लेता हूँ कि मैं किसी भी प्रकार का चाइना के समान नहीं खरीदूंगा।"
कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना जैसे-
" आपके पास फोन भी चाइना का है "
"आपके घर में चाइना के सामान है "
" आम आदमी ही क्यो बहिष्कार करे। "
"सरकारे कब करेंगी "
ऐसी हजारों बातों को भारतीय सेना के सम्मान में एक तरफ रख दीजिए।सेना सर्वोपरि ही हमारी।
अरे ! भाई हमे किसी से कोई मतलब नही है।
हमे खुद से शुरुआत करनी है बाकी का काम स्वत: ही होगा।
एक बात बताओ," भारतीय सेना का जवान हमारी भारतीय सीमा की रक्षा करते हुए शहीद हुए हैं भाई। भारत माता की सेवा करते हुए सेना के जवान इतना नही सोचते भाई तो हम चीनी सामानों का बहिष्कार करने में क्यों सोचें।

देखो भाई "भारतीय सेना के वीर जवानो को सच्ची श्रद्धांजलि देनी हैं मुझे,मैंने तो शुरुआत कर दी हैं।"

।। जय हिद। वंदेमातरम ।।
प्रस्तुति :- दुर्गाराम सीरवी कोयम्बटूर तमिलनाडु..
Posted By : Posted By Manohar Seervi on 17 Jun 2020, 06:28:08
संस्कृति की सौरभ---
हम नारियल क्यों अर्पित करते हैं?
भारतीय संस्कृति में मंदिर के लिए सबसे लोकप्रिय भेंट 'नारियल 'है।देवी-देवताओं की पूजा-स्तुति करने के लिए नैवेद्य के साथ नारियल चढ़ाने की भी परम्परा है।विवाह और पर्वों पर,नयी गाङी,घर-मकान,सङक,पुल ,दुकान का उपयोग करने से पूर्व भी नारियल भेंट किया जाता है। जल से भरा एक कलश लेकर उस पर आम के पत्ते सजाये जाते है और उस पर एक नारियल रखा जाता है ।इससे महत्वपूर्ण अवसरों,पर्व-उत्सवों पर पूजा भी की जाती है ।नारियल (श्री फल)भेंट कर साधु-संतों और अतिथियों का बहुमान भी किया जाता है ।भगवान को प्रसन्न करने या अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हवन करते समय यज्ञ की अग्नि में भी नारियल को अर्पित किया जाता हैऔर नारियल को फोङा जाता है तथा भगवान के सामने रखा जाता है ।जिसे बाद में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है ।सूखे नारियल के ऊपर के गुच्छे को छोड़कर,उसका रेशा उतार दिया जाता है ।नारियल के ऊपर के निशान एक प्राणी के सिर जैसे दिखाई देते है ।नारियल फोङना अहं को समाप्त करने का प्रतीक है ।अन्दर का रस जो हमारी वासनाओं का प्रतीक ..
Posted By : गोविन्द पंवारon 17 Jun 2020, 05:09:50
जब हम किसी और से संपर्क साधते हैं तो इस बात की आशा करते हैं कि वह अच्छा आचरण करें। यह जरूरी नहीं कि मुक्के का जवाब मुक्का ही हो। अच्छा आचरण वह है जिसमें बुरी स्थितियों को अच्छे एवं सुन्दर तरीके से पेश किया जाए। दूसरों से हम कैसा व्यवहार करते हैं चाहे स्थिति विपरीत ही क्यों न हो, हमें उत्तेजित या शान्त, भ्रष्ट या ईमानदार, बर्बर या सभ्य बना सकता है। अच्छी आदतें, अच्छे मित्रों की तरह होती हैं जो आपको ऐसी स्थिति में ले जाते हैं, अन्य गुण यदि आपका आचरण अच्छा है यह तुरन्त दृष्टिगोचर हो जाता है। सभ्य होने का कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता अलबत्ता यह आपको कुछ प्राप्त करवाता है। यह बात श्ांका से परे है कि हम सभी में किसी न किसी गुण की कमी होती है, और इसी कारण ज्ञान का गुणगान करते हैं और इसके महत्व को समझते हैं। सद्गुणों की सबसे मौलिक बात जो हम सभी नहीं अपनाते हैं वह है इसका निरन्तर अभ्यास करना। इन सद्गुणों से ही हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हर चीज सही ढंग से हो और हमें दूसरों की राय भी मिले। दयालुता एवं दूसरों के बारे में सोचने जैसे सद्गुणों को छोड़कर उस चीज में लगातार ..
Posted By : गोविन्द पंवार on 16 Jun 2020, 04:03:47
रिश्तों के तानेबाने की मजबूत डोर 'परिवार'

हर इंसान के जीवन की पहली पाठशाला परिवार को ही कहा जाता है। परिवार जो अपनों के साथ और संबल का ठिकाना होता है। जहां एक ही छत के नीचे रहकर सुख-दुख साझा करते हुए जीवन जीया जाता है। परिवार में ही किसी समाज के भावी नागरिक इंसानियत का पाठ पढ़ते हैं। जिंदगी का हर वो सबक इसी आंगन में मिलता है, जो आगे चलकर बच्चों को संपूर्ण व्यक्तित्व का धनी बनाता है तो बड़ों को संभाल और देखभाल का आधार देता है। परिवार और उसमें मौजूद आपसी जुड़ाव एक मजबूत पृष्ठभूमि-सा है, जो हमें हर परिस्थिति में जीने का हौसला देता है। परिवार पूरे समाज को आधार देता है। जिसकी नींव पर हम सबका जीवन टिका होता है।

खुशियों और जिम्मेदारियों का मेल

पारिवारिक व्यवस्था सही मायनों में हमारे जीवन का आधार स्तंभ है। सामाजिक जीवन में साथ रहने का अर्थ होता है सुख-दुख साझा करने की सोच, अपनेपन का पाठ और दिलों का मेल। हमारे यहां हर तबके के परिवार में यह सोच देखने-जानने को मिलती है। हर तरह से एक-दूसरे के साथ समन्वय और सहयोग भरा भाव ही पारिवारिक संबंधों का संबल होता है। परि..
Posted By : Raju Seervi on 15 Jun 2020, 14:26:43
सब कुछ बदल गया

कहां खो गए वो जीवन के पल
वो जीवन की रंगीनियां
देखते निहारते तितलियां
मिलते मुस्कुराते दिन कट जाते थे
अब दिलोदिमाग में…
कोई नहीं रहता !!
मानो सब कुछ बदल गया है!!
दस्तकें होती रहती हैं, लेकिन
अब दिल शांत रहता है
थी उत्साह और उमंगे
जीवन की धारा
अब खामोश सी
मानों वृक्ष के ठूँठ सी हो गयी है

मेरे दिलो-दिमाग में अब कोई नहीं रहता !!
मानों सब कुछ बदल गया है!!
खामोशी वहां रहती है,
जहाँ लगती थी महफिलें
ठहाके लगते थे जहां
अब वो इमारतें बनी खंडहरें सुनसान है
मेरे दिलोदिमाग में अब कोई नहीं रहता !!
मानो सब कुछ बदल गया है!!
दीवारों पे जाले हैं बैठी धूल की परतें है
यादें बनी धुंधली है…
कब तक महफिलों के संग रह पाता
हम बैठे रह गए, महफ़िल उठ चली गयी
मेरे दिलोदिमाग में अब कोई नहीं रहता
मानों सब कुछ बदल गया है!!
अँधेरे ही अँधेरे अब दिखने लगे हैं,
महफिलों का साथ छूटा अब
तो आहटों से भी डरने लगे हैं
कभी सूर्य से आंखें मिलाते थे
अब अंधेरों से भी भय होने लगा है
मेरे दिलोदिमाग में अब कोई नहीं रहता !!
मेरे दिल में…
अब कोई नहीं रहता <..
Posted By : Manohar Seervi on 12 Jun 2020, 10:56:29
हम मंदिर में घन्टी (टंकोर)क्यों बजाते हैं?
अक्सर छोटे बङे सभी मंदिरों में प्रवेश द्वार के पास ऊँचाई पर एक या अधिक घंटियाॅ (टंकोर)लटकी रहती हैं ।मन में श्रद्धा-भक्ति और आस्था का भाव लेकर श्रद्धालु मंदिर-प्रवेश करते ही घंटी (टंकोर) बजाता है और फिर भगवान के दर्शन,पूजा-पाठ और प्रार्थना स्तुति के लिए आगे बढ़ता है ।साथ में आए छोटे बच्चों को उछलकर या ऊपर उठाए जाने के पश्चात् घंटी बजाकर खूब आनंद मिलता है ।आखिर हम घंटी क्यों बजाते हैं?क्या यह भगवान को जगाने के लिए है?परन्तु भगवान तो कभी सोते नहीं ।क्या इससे हम भगवान को अपने आने की सूचना देते हैं?उनको यह बताने की आवश्यकता नहीं,क्योंकि वे तो सर्वज्ञ है ।तो क्या यह भगवान के क्षेत्र में जाने की अनुमति लेने का एक ढंग है?यह तो अपने ही घर में आना है,जिसके लिए प्रवेश की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं ।भगवान तो हर समय सदा हमारा स्वागत करते हैं ।फिर हम घंटी क्यों बजाते हैं? घंटी बजाने से जो ध्वनि निकलती है,वह शुभ समझी जाती है ।यह ऊँकी ध्वनि उत्पन्न करती है,जो ईश्वर का सर्व व्यापक नाम है ।भगवान सर्व-मंगलकारी है ।इस सूक्ष्म दृष..
Posted By : Manohar Seervi Posted By on 04 Jun 2020, 11:51:12
क्या जीवन में जरुरी है गंभीरता ?
कुछ लोग जीवन में हमेशा गंभीर रहते हैं ।चाहे उन्हें ढेरो सफलताएं मिल जाएं पर उनके चेहरे पर थोड़ी सी भी मुस्कान नहीं आती ।ऐसे लोग सोचते हैं कि अगर वे गंभीर नहीं रहेॆंगे तो लोग उन्हें हल्के में लेंगे। मानवीय स्वभाव के अनुसार वे भी हंसना चाहते हैं पर ऊंचा ओहदा व झूठी शान उन्हें ऐसा करने से रोकती है ।
दुनिया में आप कितनी भी भागदौड़ करले पर अंत में आपको लगता है कि सारी जमा पूंजी व्यर्थ है , सबसे जरुरी तो सबके साथ मिल बैठ कर हंसना गुनगुनाना और दूसरों का दर्द बांटना हैं । कुछ लोग जीवन को गंभीरता के साथ गुजार देते हैं और आखिर में उन्हें महसूस होता हैं कि वे कुछ खास नहीं कर पाए।।जीवन में या तो सफलता हासिल की जा सकती है या सार्थकता और जो व्यक्ति सफल होने के साथ साथ सार्थकभी बन जाता है ,वह महान बन जाता है। सफलता सिर्फ आपको खुश कर सकती है परसार्थकता से आप दूसरों का जीवन भी बदलते है।सार्थक बनने के लिए जीवन में जबरन घुसी हुई गंभीरता को कम करना होगा । हंसते हंसते दूसरों को भी हंसाना होगा । हर परेशानी में मुस्कराने वाला व्यक्ति मन से ग..
Posted By : Posted By Manohar Mysore on 01 Jun 2020, 04:15:00
सिरवी समाज डांट काम की टीम को बहुत बहुत बधाई जिन्होंने भारत में लॉकडाउन की घडी में समाज में एक अच्छी पहल करके हर शनिवार को दिवान साहब से सीधा संवाद करके अन छुए पहलुओं को दिवान साहब के श्री मुख से सुनने को मिल रहा है इसी कड़ी में गत शनिवार को एक अच्छी बात यह भी हुईं की आरती में खिलजी के स्थान पर आसूर शब्द बोला जायेगा।ये प्रस्ताव MP से CA भगवान जी लछेटा ,अध्यक्ष सीरवी समाज ट्रस्ट इंदौर वालों के द्बारा लाया गया था इसके ऊपर दिवान साहब ने अपनी इच्छा प्रकट करते हुए मोखीक स्वीकृति दे दी गई बहुत अच्छा हुआ हमारे मन में भी बहुत दिनों से बदलाव की इच्छा थी

उसी तरह दो और बदलाव की जरूरत है हो सकता है में गलत भी हो सकता हु।

1-जब हमारे यहां माताजी अम्बापुर से लेकर बिलाड़ा तक पथारे साथ में नन्दी(पोठीया) था नन्दी यानी धर्म माताजी ने हमेशा धर्म को साथ लेकर चलते थे धर्म का उपदेश देते थे आज बिलाड़ा में भी मन्दीर में जाने से पहले नन्दी की स्थापना है। नन्दी का दर्शन कर मन्दीर में जाते हैं नन्दी यानी धर्म। धर्म यानी शिव । शिवजी के दर्शन कर मन्दीर में जाते हैं बिलाड़ा की भांति ह..
Posted By : Manohar Seervi Posted By on 10 May 2020, 11:17:09
सीरवी समाजबंधू आर्थिक रूप से अन्य कई समाजों के मुकाबले संपन्न है अर्थात धनि है, धनवान है, ज्ञानी है, दानी है, बुद्धिमान है, चारित्रसम्पन्न है, सुस्वभावी है, शिक्षित (एज्युकेटेड) है, मिलनसार है, ईमानदार है, व्यापार में होशियार है, मेहनती है फिर भी समाज दिन-ब-दिन पिछड़ता जा रहा है, अपनी पहचान को, अपने गौरव को खोता जा रहा है... क्यों??? क्योंकि एकता का आभाव है । समाज में एकता की कमी है । एकता से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है । एकता ही समाजोत्थान का आधार है। जो समाज संगठित होगा, एकता के सूत्र में बंधा होगा उसकी प्रगति को कोई रोक नहीं सकता किन्तु जहाँ एकता नहीं है वह समाज ना प्रगति कर सकता है, ना समृद्धि पा सकता है और ना अपने सम्मान को, अपने गौरव को कायम रख सकता है। सीरवी समाज इसका जीता-जागता उदहारण है । हम समाजबंधु एकसाथ रहते तो है लेकिन क्या हम उन्नत्ति-प्रगति के लिए एक-दूजे का साथ देते है? नहीं ; तो सिर्फ एकसाथ रहने का कोई मतलब नहीं । एकसाथ इस शब्द को कोई अर्थ तभी है जब हम एकसाथ रहे भी और एक-दूजे का साथ दे भी । ऐसी एकता को ही सही मायने में 'एकता' (Unity) कहा जाता है ।

समाज में एकता को क..
Posted By : Posted By seervi on 25 Apr 2020, 09:59:08
घूंघट प्रथा - एक कुप्रथा
समाज की समस्या : हमारे घर की औरतें घूंघट नहीं निकलती, वो सलवार कमीज़ और जीन्स पहनती है। वो आज के जमाने के हिसाब से चलती है। वो हमारी संस्कृति का अनुसरण नहीं करती हैं ।

एक औरत की आवाज़: घूंघट प्रथा एक कुप्रथा है जिसका मुझे अनुसरण नहीं करना है। इससे पहले कि मै अपने विचार प्रस्तुत करू उदाहरण के तौर पर एक कहानी प्रस्तुत करना चाहती हूं ।
"एक अंधे दंपति को खाना बनाने में बड़ी परेशानी होती थी,जब अंधी खाना बनाती थी एक कुता आकर ले जाता था। तब अंधे को एक समजदार व्यक्ति ने आइडिया दिया कि तुम डंडा लेकर थोड़ी थोड़ी देर में फटकते रेहना जब तक अंधी रोटी बनाएं।
जब कुत्ता तुमारे हाथ मै डंडा देखेगा और डंडे की खटखट सुनेगा तो डर के भाग जाएगा रोटियां सुरक्षित रहेगी। यह युक्ति काम कर गयी अंधे दंपति खुश हो गए।
कुछ वर्षो बाद उनके घर मै एक पूत्र हुआ जिसकी आंखे भी थी और वो एकदम स्वस्थ था। उसे पढ़ा लिखाकर बड़ा किया । उसकी शादी हुई और बहू आयी। बहू जैसे ही रोटी बनाने लगी तो लड़का डंडा लेकर दरवाजे पर खटखट करने लगा। बहू ने पूछा यह क्या कर रहे हो और क्यो ? तो ..
Posted By : Posted By गोपाराम पंवार on 11 Apr 2020, 07:10:41
कुरितियों एंव रूढिवादी परम्पराओं के अधीन होना कायरता हैं ओर विरोध करना पुरूषार्थ हैं।

एक तेरहवीं के दिन मैं बैठा था। पूरे कुनबे के लोग पगड़ी बांध रहे थे। किसी के ससुराल वाले लाये तो किसी के ननिहाल वाले लाये। मैंने एक बुजुर्ग से पूछा कि आपके दादा जी मरे थे तो क्या सभी पौतों के लिए पगड़ी लाई व बंधाई गई? बताया कि सिर्फ मेरे ताऊ जी के पगड़ी बांधी गई थी।

दरअसल पहले सामाजिक ताना-बाना बहुत मजबूत था और किसी परिवार के बुजुर्ग की मृत्यु पर समाज के फैसलों में भागीदारी के लिए एक उत्तराधिकारी चुना जाता था।घर में जो भी बड़ा होता था उसको तेहरवीं के दिन पगड़ी बांधकर विधिवत उत्तराधिकारी मान लिया जाता था।

आज पूरे कुनबे अर्थात दादा की मौत पर दादा के भाई के पौतों को भी पगड़ी बंधाई जाती है। यानि मरा एक और उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिए जाते है अनेक, मौत व उत्तराधिकारी नियुक्ति की प्रक्रियाओं को महोत्सव का स्वरूप दे दिया गया है।

किसी की मौत होती है तो घर में निराशा व मायूसी का माहौल पैदा हो ही जाता है तो उसको ढांढस बंधाने का कर्तव्य समाज का होता है।

जिसकी मौत होती ..
Posted By : Posted By seervi on 09 Apr 2020, 11:32:35
व्यावहारिक जगत में श्री आई माताजी को साथ रखिये

श्री आई माताजी में विश्वास की कमी के कारण, दूषित वातावरण का असर पडने के कारण एवं पूर्व के संस्कारों के कारण बहुत बार हम लोगों के मन में परिवार को लेकर चिन्ताएँ आ सकती हैं। उस समय जगत का महत्व दैवी शक्ति की अपेक्षा अधिक हो जाता है। वस्तुतः जागतिक चिन्ता तभी आती, जब दैवी शक्ति गौण हो जाती हैं और जगत् प्रधान। इसलिये खूब सावधान रहना चाहिये कि एक क्षण के लिये भी श्री आई माताजी गौण नहीं होने पायें। आप विश्वास रक्खें कि जैसे-जैसे माताजी को मुख्य उद्देश्य मानते जायेंगे वैसे-वैसे यह चिन्ता हटती जायगी। एक बात और है---साधना मार्ग में खासकर श्री आई माताजी-शरणागति में किसी भी जागतिक चिन्ता को मन में स्थान ही नहीं देना चाहिये। यदि हम माताजी के हो गये, नहीं, सदैव ही माताजी के थे, हैं और रहेंगे तो हमसे सम्बद्ध यावन्मात्र पदार्थ भी माताजी के ही हैं। क्या माताजी को अपनी चीजों का ध्यान नहीं है ? क्या हम उनसे ज्यादा चतुर एवं बुद्धिमान हैं, जो उनकी अपेक्षा भी अधिक अच्छी तरह किसी चीज की संभाल करेंगे ? वस्तुतः सच्ची बात तो यह ..
Posted By : Posted By seervi on 02 Apr 2020, 06:14:37
जय श्री आईजी री सा
👏🏽👏🏽
👉🏽 हमारे सामाजिक परिवेश में बहुत सारी ऐसी बीमारियां होती है जो खाने-पीने और छूने से फैलती है। वर्तमान समय में कोरोना विषाणु जनित रोग जो चल रहा है वह भी एक छूत की बीमारी ही है ।
सीरवी समाज में काफी लंबे समय से एक कुप्रथा चली आ रही है सहभोज यानी कि साथ में बैठकर एक ही बर्तन में भोजन करना।
सह भोज को मैं कुप्रथा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इससे केवल मात्र नुकसान ही है चाहे वह भौतिक रूप से हो या फिर चाहे आध्यात्मिक रूप से ।
भौतिक रूप से नुकसान का मतलब हमारे अमूल्य मानव शरीर को इस प्रथा द्वारा होने वाली बीमारी से है।
कोरोना रोग के अलावा भी ऐसी बहुत सारी छुआछूत की बीमारियां कम्युनिकेबल डिसीज है जो मात्र साथ में बैठकर भोजन करने से होती है हां यह अलग बात है कि उन बीमारियों का इनक्यूबेशन पीरियड काफी लंबा होता है और वह हमारे शरीर पर कोरोनावायरस की तरह तुरंत असर ना डाल कर बहुत लंबे समय बाद असर डालती है यानी कि हमको बीमार करती है।
जैसे - कोलेरा हेपेटाइटिस ए टाइफाइड कोरोना वायरस अन्य।
इस प्रकार के सभी रोग मुख्य रूप से सहभोज से ही होते ..
Posted By : Posted By seervi on 13 Mar 2020, 08:27:52
बाल कल्याण समिति
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किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा -27 के तहत प्रावधानों के अनुसार और किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) नियम -15 के नियम -15 के साथ पढ़ें, मॉडल नियम, 2016 शक्तियों और कर्तव्यों के निर्वहन के लिए जिलों में कल्याण समितियां समय-समय पर इस अधिनियम और नियम के तहत बच्चों की देखभाल और सुरक्षा की आवश्यकता के संबंध में ऐसी समितियों को सम्मानित करती हैं।

किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा -29 के अनुसार, समिति के पास देखभाल और सुरक्षा की आवश्यकता, बच्चों की देखभाल, संरक्षण, उपचार, विकास और पुनर्वास के लिए मामलों के निपटान का अधिकार होगा, साथ ही उनकी बुनियादी जरूरतों और सुरक्षा के लिए। जहां किसी भी क्षेत्र के लिए एक समिति का गठन किया गया है, ऐसी समिति किसी भी अन्य कानून में निहित किसी भी चीज के बावजूद, लेकिन इस अधिनियम में दिए गए अन्यथा स्पष्ट रूप से सहेजने के अलावा, इस अधिनियम के तहत सभी कार्यवाही से विशेष रूप से निपटने की शक्ति है बच्चों की देखभाल और सुरक्षा की जरूरत ह..
Posted By : Raju Seervi Posted By on 08 Mar 2020, 12:20:50
समाज को गतिशील, विकासोन्मुख एवं प्रतिशील बनाने के लिए संगठित होना एक आवश्यकता हैं। संगठन विहीन समाज बिना पतवार के नाव जैसी होती है , जिसकी कोई दिशा नहीं होती और न ही कोई उद्देश्य। विश्व के समस्त समाज शास्त्रियों ने समाज और संगठन के बारे में सदैव यही बताया है, कि संगठन समाज का प्राण है।  इसी परिप्रेक्ष्य में आगे बढ़ते हुए सीरवीयों के कल्याण हेतु सीरवी समाज को संगठित करने, एकजुट करने का कार्य पिछले कई वर्षों से किया जा रहा है। विभिन्न स्तरों पर संगठन का निर्माण किया गया है और संगठन को गति प्रदान करने के लिए समर्पित, सेवा भाव से युक्त कार्यकर्ताओं की सेवायें ली जाती है। अखिल भारतीय स्तर से लेकर ग्राम स्तर तक संगठन को जोड़ने का कार्य चल रहा हैं।  संगठन के लोग अपना-अपना कार्य कर रहे है। 

आज के परिप्रेक्ष्य में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में राजनीती ने अपना प्रभाव डाला है।  हमारी सोच, हमारे कार्य, हमारे तौर तरिके ही सभी राजनीती से प्रभावित है , स्वाभाविक है। संगठन भी अछूता नहीं है। राजनीति की कूटनीति सर्वव्यापी हो चुकी है।  व्यक्ति का मांस इस छूत की बी..
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