सीरवी समाज - ब्लॉग

Result : 121 - 124 of 124   Total 9 pages
Posted By : Posted By on 21 Jul 2019, 04:36:21
सीरवी कौम एक ऐसी कौम है जिसके हर जन में "सीर"का मूल भाव समाया है। सीर का मूल अर्थ साझा है।साझा अर्थात एक दूसरे का सहयोग लेकर आगे बढ़ना। एक दूसरे की भावनाओ की कद्र करना।एक दूसरे के सुख-दुःख में साथ देना। यह कार्य हमारे पुरखों ने बड़ी दिलेरी से किया है। जब पुरातन तरीके से खेती की जाती थी,आज की तरह वे वैज्ञानिक संसाधनों या उपकरणों से युक्त नही थे। वे बैलों से खेती करते थे, पशुपालन करते थे औऱ अपनी आजीविका चलाते थे। वे कठोर मेहनती थे। उस समय संयुक्त परिवार प्रथा थी,घर-परिवार में गजब का अनुशासन औऱ मर्यादाएं थी। सब अपनी मर्यादाओं और सीमाओं से वाकिफ थे। घर-परिवार का एक ही मुखिया होता था, उनका सब कड़ाई से पालना करते थे। उस समय बहुत बड़े-बड़े कुटुंब थे। ऐसे परिवार को गवारी बोलते थे। उस गवारी की बड़ी पेठ होती थी। घर-परिवार में प्रेम-सौहार्द्ध का वातावरण होता था। समाज के लोग प्रेम-सौहार्द्ध को प्रथम वरीयता देते है। यदि किसी कारणवश परिवार में विवाद की स्थिति पैदा हो जाती थी तो वे किसी मांगलिक अवसर या सामाजिक कार्य के अवसर पर समाज के लोग उनको आपस में साथ मे बैठाते थे, उनमें आप..
Posted By : Posted By जितेन्द्र सिंह राठौड़ on 21 Jul 2019, 04:02:29
सीरवी कौम एक ऐसी कौम है जिसके हर जन में "सीर"का मूल भाव समाया है।सीर का मूल अर्थ साझा है।साझा अर्थात एक दूसरे का सहयोग लेकर आगे बढ़ना।एक दूसरे की भावनाओ की कद्र करना।एक दूसरे के सुख-दुःख में साथ देना।यह कार्य हमारे पुरखों ने बड़ी दिलेरी से किया है।जब पुरातन तरीके से खेती की जाती थी,आज की तरह वे वैज्ञानिक संसाधनों या उपकरणों से युक्त नही थे।वे बैलों से खेती करते थे,पशुपालन करते थे औऱ अपनी आजीविका चलाते थे।वे कठोर मेहनती थे।उस समय संयुक्त परिवार प्रथा थी,घर-परिवार में गजब का अनुशासन औऱ मर्यादाएं थी।सब अपनी मर्यादाओं और सीमाओं से वाकिफ थे।घर-परिवार का एक ही मुखिया होता था,उनका सब कड़ाई से पालना करते थे।उस समय बहुत बड़े-बड़े कुटुंब थे।ऐसे परिवार को गवारी बोलते थे।उस गवारी की बड़ी पेठ होती थी।घर-परिवार में प्रेम-सौहार्द्ध का वातावरण होता था।समाज के लोग प्रेम-सौहार्द्ध को प्रथम वरीयता देते है।यदि किसी कारणवश परिवार में विवाद की स्थिति पैदा हो जाती थी तो वे किसी मांगलिक अवसर या सामाजिक कार्य के अवसर पर समाज के लोग उनको आपस में साथ मे बैठाते थे,उनमें आपस में प..
Posted By : Posted By जितेन्द्र सिंह राठौड़ on 20 Jul 2019, 08:13:30
जीवन में ज्ञान और प्रेरणा कहीं से भी एवं किसी से भी मिल सकती है। मित्रों आज मैंने एक कविता पढ़ी , पढकर लगा कि प्रकृति ऐसे अंनत कारणों से भरी हुई है, जो हमें सिखाती है कि जीवन हरपल आनंद से सराबोर है। नदियों का कल कल करता संगीत, झूमते गाते पेङ, एवं छोटे छोटे जीव हमें सिखाते हैं कि जीवन को ऐसे जियो कि जीवन का हर पल खुशियों की सौगात बन जाये।
मैं आपके साथ भी वह कविता बांटना चाहुँगा ! !
कुकङु कू कहता मुर्गा, जागो जागो ओ नादान
शीध्र सवेरे उठने वाला, पाता है बल विद्यामान।
कू-कू करती कहती कोयल, मीठी बात हमेशा बोल
मेल जोल ही बङी चीज है, कभी न लेना झगङा मोल।
चीं-चीं करती कहती चिङिया हमको बारंबार
संघटन में शक्ती है बङी, दुश्मन जाता जिससे हार।
उपरोक्त कविता में कितनी आसानी से जीव जंतुओं ने अपनी अच्छाईयों से जीवन को संवारने का संदेश दिया है। ऐसे कई जीव हैं जो हमे सकारात्मक जीवन की प्रेरणा देते हैं। कुनबे के साथ रहने वाली चींटी, संर्घष और मेहनत का सजीव उदाहरण है। हिम्मत करने वालों की हार नही होती के माध्यम से चीटियों के संर्घष को बहुत ही खूबसूरती से परिलाक्षित किया..
Posted By : Posted By Jitender Singh Bilara
जहा तक मेने पढ़ा है समाज की अवधारणा किताबो में लेखको ने बड़ी ही क्लिस्ठ भाषा में समझाई, एक आम मस्तिस्क इतनी कठिन भाषा को समझ कर वास्तविकता के धरातल को समझने में अपना जीवन व्यतीत नहीं करता, उसके लिए समाज एक समूह है, जहा उसके आस पास उसके अपने उसे जानने वाले या जान सकने वाले मनुष्यों का जमावड़ा हो l कई मायनों में जब मेने देखा की जिसे में समाज मानती हु उस समाज की व्यापाकता के न नियम होते है न निर्देश, मेरी जैसी कामकाजी महिला के लिए मेरा घर, परिवार, चौक चोराहे से होते हुए बस स्टैंड, बस और मेरा कामकाजी क्षेत्र मेरा समाज है l यह समाज के अलग अलग स्त्रोत है और इस में अभिनय करने वाले चेहरे भले ही अलग अलग हो किन्तु मानसिकता लगभग एक जैसी होती है, फिर किसी ने मुझे यह महसूस कराया की समाज को हम किसी दायरे में नहीं बाट सकते l यह धरती हमारा मानव समाज है, यह देश हमारा रास्ट्रीय समाज है, यह राज्य हमारा भोगोलिक समाज है, यह जिला हमारा प्रशाशनिक समाज है, यह नगर गाँव हमारा आश्रय समाज है, यह परिवार मेरी सुरक्षा का समाज है l इस सभी समाजो में अपने अस्तित्व को ढूंडते हुए मुझे अपने जीवन की तमाम उपल..
Result : 121 - 124 of 124   Total 9 pages