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रिश्तों के तानेबाने की मजबूत डोर \'परिवार\' , प्रस्तुति :- मनोहर सीरवी
Posted By : गोविन्द पंवार on 16 Jun 2020, 04:03:47

रिश्तों के तानेबाने की मजबूत डोर 'परिवार'

हर इंसान के जीवन की पहली पाठशाला परिवार को ही कहा जाता है। परिवार जो अपनों के साथ और संबल का ठिकाना होता है। जहां एक ही छत के नीचे रहकर सुख-दुख साझा करते हुए जीवन जीया जाता है। परिवार में ही किसी समाज के भावी नागरिक इंसानियत का पाठ पढ़ते हैं। जिंदगी का हर वो सबक इसी आंगन में मिलता है, जो आगे चलकर बच्चों को संपूर्ण व्यक्तित्व का धनी बनाता है तो बड़ों को संभाल और देखभाल का आधार देता है। परिवार और उसमें मौजूद आपसी जुड़ाव एक मजबूत पृष्ठभूमि-सा है, जो हमें हर परिस्थिति में जीने का हौसला देता है। परिवार पूरे समाज को आधार देता है। जिसकी नींव पर हम सबका जीवन टिका होता है।

खुशियों और जिम्मेदारियों का मेल

पारिवारिक व्यवस्था सही मायनों में हमारे जीवन का आधार स्तंभ है। सामाजिक जीवन में साथ रहने का अर्थ होता है सुख-दुख साझा करने की सोच, अपनेपन का पाठ और दिलों का मेल। हमारे यहां हर तबके के परिवार में यह सोच देखने-जानने को मिलती है। हर तरह से एक-दूसरे के साथ समन्वय और सहयोग भरा भाव ही पारिवारिक संबंधों का संबल होता है। परिवार में खुशियों और जिम्मेदारियों का एक अनोखा मेल होता है, जो सभी को आपस में बांधे रखता है। यही बंधन हमें अच्छे-बुरे वक्त में थामने का काम करते हैं। बुजुर्गों का मान और बच्चों को मनुहार परिवार में ही मिल सकती है। इसलिए रिश्तों के ताने-बाने में यह आपसी बंधन जरूरी भी है क्योंकि यह जुड़ाव हर उम्र के लोगों को कुछ ना कुछ देता ही है।

संस्कार और समझ का आधार

आज के परिवेश में सबसे अहम बात यह है कि भावी पीढ़ी में अपनों के बीच रहते हुए ही संस्कार और समझ पनपते हैं। आज के समय में नई पीढ़ी को सधी हुई सोच और जीवन की समझ देना परवरिश का सबसे अहम और मुश्किल पहलू है। ऐसे में परिवार में पलती परंपराएं और सामाजिक जुड़ाव का माहौल बहुत हद तक इस मुश्किल को आसान करते हैं।
गैजेट्स और इंटरनेट की आभासी दुनिया से परे परिवार में मिलने वाला बड़ों का साथ बच्चों का वास्तविक दुनिया से परिचय करवाता है। ऐसा माहौल देता है जिससे बच्चों में संवेदनशीलता और व्यवहार कुशलता स्वाभाविक रूप से आ जाती है। परिवार में अपनों के बीच बड़े होते बच्चों को भरपूर प्यार और स्नेह मिलता है। यही प्यार बच्चे के अंदर सुरक्षा की भावना को बढ़ाता है।

अपनों संग साझे सुख

परिवार में सभी आपस में भावनाओं की डोर से बंधे होते हैं, इसलिए अपनों का साथ मन को छोटी-छोटी खुशियों से लबरेज कर देता है। रिश्तों का तानाबाना स्नेह बांटना भी सिखाता है और खुशियों को जीना भी। कहा भी जाता है कि खुशियां बांटने से बढ़ती हैं और दुख बांटने से कम होते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह हंसी-खुशी का माहौल सब परिवाजनों के साथ रहकर ही संभव हो पाता है।
हम भारतीयों का मन और जीवन दोनों ही उत्सवधर्मी है। समझने वाली बात है कि इन तीज त्योहारों की रौनक भी हमारे अपनों के साथ से ही है। यही वजह है कि परिवार इन रिश्तों के जरिए संस्कृति और संबंध दोनों को सहेजने का काम करता है। दिलों को जोड़ने वाले सांस्कृतिक पर्व अपनों से भी जुड़ाव बनाए रखते हैं। तभी तो मन में उत्साह और उमंग जगाने वाली खुशियां अपनों के बिना अधूरी-सी लगती हैं।

जड़ों से जुड़ाव

परिवार हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। खासकर संयुक्त परिवार में तो हर उम्र के लोग मिलजुलकर रहते हैं। साथ रहते हुए इंसानियत से जुड़ी जो समझ और सीख घर के सदस्यों को मिलती है वो हमेशा उन्हें जमीन से जोड़े रखने का काम करती है। अपनों से मिले अनुभव और संस्कार किसी भी इंसान के जीवन को सही और सार्थक दिशा दे सकते हैं। इतना ही नहीं आज की भागमभाग भरी जिंदगी में कामकाजी महिलाओं के लिए भी संयुक्त परिवार एक सपोर्ट सिस्टम की तरह है। सबका साथ पाकर कामकाजी महिलाओं को संबल और सहायता मिलती है। बच्चों को अकेले छोड़ने का अपराधबोध उनके मन में नहीं पलता।

आओ सहेजें बिखरते तानेबाने को

दुनिया के हर समाज में परिवार को महत्व दिया गया है। लेकिन ये भी सच है कि दुनियाभर में ही नहीं हमारे देश में भी अब पारिवारिक ढांचा बिखर रहा है। यही वजह है कि इसे सहेजने के लिए भी कोशिशें की जानी जरूरी हैं। हमारे देश में भी बीते कुछ बरसों में ना केवल तलाक के मामलों में इजाफा हुआ है बल्कि बड़ी पीढ़ी भी असुरक्षा की पीड़ा झेल रही है। आज की जीवनशैली ही कुछ ऐसी हो चली है कि परिवार छोटे और छोटे होते जा रहे हैं। जीवन की आपाधापी में इतना कुछ नया जुड़ रहा है कि परिवार और अपने ही पीछे छूट रहे हैं। परिवारिक कलह के चलते आए दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें अपने ही अपनों के खिलाफ आपराधिक गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपनों की भावनाओं को अनदेखा करने की संस्कृति पनप रही है।

ऐसे में हम सबका सचेत होना आवश्यक है क्योंकि जीवन की पृष्ठभूमि ही कमजोर हो गई तो हम सम्बल कैसे पाएंगे? पारिवारिक ढांचे से जुड़ी ऐसी चिंताएं वैश्विक स्तर पर उभर रही हैं। यही वजह है कि परिवार के प्रति लोगों में लगाव को बढ़ाने और इस संस्था की अहमियत बताने के लिए संयुक्त राष्ट्र हर साल 15 मई को 'परिवार दिवस" मनाता है।

प्रस्तुति :- मनोहर सीरवी (राठौड़) सुपुत्र श्री रतनलालजी राठौड़ जनासनी - साँगावास { मैसूरु - कर्नाटक }