
*करोड़ों के रिसेप्शन और कौड़ियों के रिश्ते: दिखावे की आग में झुलसती बेटियाँ, अमीरी का नशा और रिश्तों का जनाज़ा: क्या यही है हमारे समाज की नई पहचान?*
प्रस्तुति:- प्रमिला चौधरी
आज जब मैं अपने सीरवी समाज की ओर देखती हूँ, तो सर गर्व से ऊँचा भी होता है और शर्म से झुक भी जाता है। हम ऊँचे महलों में रह रहे हैं, बड़ी गाड़ियों में घूम रहे हैं, लेकिन क्या हमारी सोच और हमारे संस्कार भी उतने ही ऊँचे हुए हैं? आज समाज के 'बौद्धिक स्तर' की बातें करना बेमानी सा लगता है, जब हम अपनी ही बेटियों की चीखें सुनने में असमर्थ हैं। कल तक जिसे 'सात जन्मों का अटूट बंधन' माना जाता था, आज वह मात्र एक 'नाटक' बनकर रह गया है। विवाह अब संस्कार नहीं, बल्कि एक 'व्यापार' में तब्दील होता जा रहा है। दिखावे और अमीरी के नशे में लाखों-करोड़ों रुपए शादी समारोह (रिसेप्शन) और आयोजनों पर बहा दिए जाते हैं, लेकिन वही रिश्ता छह महीने भी नहीं टिक पाता। इस स्वार्थ की बलि सबसे ज्यादा हमारी बेटियां और बहनें चढ़ रही हैं। क्या एक पिता का धर्म केवल अपनी बेटी का घर उजड़ते देखना ही रह गया है?
आज हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम अपनी बेटी के लिए तो न्याय चाहते हैं, लेकिन घर आई बहू को वह सम्मान नहीं दे पाते। *कारण? हम 'बहू' लाए थे, 'बेटी' नहीं।* आज उन सास-ससुरों से एक सवाल: जब आपकी अपनी बेटी ससुराल से दुखी होकर घर आती है, तो आपका कलेजा फट जाता है, फिर घर आई बहू को अपनी बेटी समझने में आपका दिल पत्थर का क्यों हो जाता है? ओर उन बेटियों से भी एक विनती: ससुराल केवल एक मकान नहीं, आपका अपना घर है। जिस दिन आप सास-ससुर को माता-पिता का दर्जा दे देंगी, उस दिन पंचायतों की चौखट पर न्याय की भीख नहीं मांगनी पड़ेगी। पैसों के लालच में अपनी बेटियों को गलत घरों में मत धकेलिये। दिखावे की इस दुनिया से बाहर निकलिए। पैसों के कारण होने वाले इन रिश्तों में कभी शांति नहीं रहती और अंत में बेकसूर लड़कियां ही पिसती हैं।
आज हमें छोड़ा-मेला पर दुख तो तब होता है जब पंचायतें न्याय के बजाय पक्षपात करती हैं। हमारे समाज में पंचों को 'परमेश्वर' का दर्जा दिया गया है। पंच चाहें तो क्या नहीं कर सकते? अगर पंच पक्षपात छोड़कर, दोनों पक्षों को प्रेम से बैठाकर समझाइश करें, तो टूटते हुए घरों को बचाया जा सकता है। *एक बेटी का घर बसना किसी पुण्य से कम नहीं है।* लेकिन विडंबना यह है कि आज कुछ लालची लोगों की वजह से पंचायतों से न्याय गायब होता जा रहा है। सच्चे लोगों की आवाज दबा दी जाती है। पंचों को यह समझना होगा कि उनका एक गलत फैसला किसी की पूरी जिंदगी तबाह कर सकता है। हे समाज के कर्णधारों! अपनी कुंभकर्णी नींद त्यागो। पैसों के नशे में अंधे होकर अपनी ही बहनों-बेटियों के आंसुओं का सौदा मत करो। याद रखना, जिस घर में बेटी और बहू रोती है, उस घर की बर्बादी निश्चित है।
*हमारे समाज में कुछ हालिया घटनाओं ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया है। उसी पीड़ा और आक्रोश से उपजी ये पंक्तियाँ उन लोगों के लिए एक चेतावनी हैं जो समाज को गंदा कर रहे हैं:*
> मन करता है कि बहनों को सताने वालों का अंत कर दूं, कुरीतियों के सौदागरों को समाज के सामने नग्न कर दूं।
> जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की खुशियाँ उजाड़ते हैं, ऐसे पाखंडी पंचों और षड्यंत्रकारियों का मुख भंग कर दूं।
यह मेरी कोई शिकायत नहीं, बल्कि आपके अपने सीरवी समाज की बेटियों के मन की तड़प है। यदि मेरी किसी बात से समाज के मुखियाओं व भाई-बहनों का दिल दुखा हो, तो छोटी बहन-बेटी समझकर क्षमा करें!
सीरवी समाज डॉट कॉम