सीरवी समाज - मुख्य समाचार
Posted By : मुकेश गेहलोत, श्री सॉई मेडिकल स्टोर्स
एम.पी.की हलचल मुकेश गेहलोत
ऋषीयो की तपोभूमी भारत देश का हर पर्व- त्यौहार अपने ही अंदाज में अपनी अनूठी, संस्कृती की चादर ओढ़े इस धरा पर मानव मात्र को उस अंदाज में मोहित कर अपनी परम्परा सभ्यता व संस्कारो से अभिभूत कराता है।
चैत्र नवरात्री मां दुर्गा की उपासना से सजे चैत्र नवरात्री के इस महा अवसर पर म.प्र. के निमाड मालवाचंल में उत्साह उमंग व हर्षोउल्लास के साथ गणगौर पर्व मनाया गया। निमाड मालवा अंचल के धार झाबुआ, उज्जैन, खरगोन, रतलाम, इन्दौर जिले के सीरवी बहुमुल्य अनेक ग्रामो में सीरवी समाज द्वारा यह पर्व उत्साह उमंग व अपार श्रद्धा के साथ मनाया गया! घर-घर माताजी के ज्वारों की पूजा अर्चना व उपासना कर गणगौर रथों को नये-नये परिवेशों के श्रंृगार कर नाच-गाने के साथ इस पर्व को सामाजिक स्तर से मनाया। गणगौर पर्व निमाड़ मालवाचंल के सिर्वी समाज के सबसे बड़े पर्व के रुप में मनाया जाता है। इस पर्व के पूर्व समाजजन अपने घर-मकानों की लीपाई पुताई रंगाई करते है, और समाजजन अपने व अपने परिजनों के नये पोशाक की खरीदी भी इस अवसर पर करते है, व मॉ की उपासना आस्था, श्रद्धा से सजे इस पर्व को उत्साह उमंग व हर्षोउल्लास के साथ मनाते है। तीन से चार दिवसीय इस पर्व पर सामाजिक गोट ( भोजन) की जाती है, व तालीसा नृत्य, गरबा नृत्य व एकल नृत्य कर प्रकृती के इा अनूठे परिणय का लुप्त उठाते है।
क्या है गणगौर पर्व
होली दहन के पश्चात चेत्र कृष्ण पक्ष एकादशी को माता की मुठ रखी जाती है, निमाडी भाषा में इसे खडा होना भी कहॉ जाता है। एकादशी चेत्र कृष्ण रात्री में बॉस की टोकरीयो में गेहूं बोये जाते है वहॉ आठ दिनों तक शुद्व जल, घी चढ़ाया जाता है व विधि-विधान से व्रत पूजा अर्चना कि जाती है। तब वह गेहु ज्वारो का रुप ले लेते है व ज्वारांे में शक्ति स्वरुपा मॉ जगदम्बा साक्षात विराजमान होेकर गणगौर के रुप में घर-घर विराजीत होती है। जहॉ ज्वारों की पूजा अर्चना की जाती है उसे बाड़ी भी कहॉ जाता है इन आठो दिन बाड़ी के पास महिलाओं द्वारा रात्री में गणगौर गीत गाये जाते है गीतो में गणगौर माता के गीतो का उच्चारण होता है वही प्रतिदिन गीतो के समापन पश्चात बाड़ी माता को प्रसाद (जो घर-घर से लाया जाता है) चढ़ाया जाता है इसे तम्बोल कहा जाता है चेत्र शुक्ल तीज के रोज सिर्वी समाज द्वारा गणगौर रथो को सिंघारा जाता है व गणगौर माता जिसमें ज्वारे रख कर पूरे उत्साह के साथ घर लाया जाता है जिसमें मॉ का स्वरूप देखा जाता है अनेक गणगौरो के साथ ईश्वर राजा भी होते है ये शिवजी के रूप माने जाते है व गणगौर (रणूबाई) को मॉ पार्वती के रूप माना जाता है। रणूबाई अपने मायके आती है और उनके साथ ईश्वर राजा भी आते है और घर-घर गणगौर गीतो के उच्चारण के साथ जल भोजन फल-फूल से इ्रन्हे जिमाया जाता है व पूजा अर्चना की जाती है। रात्री में नाचने-गाने के आयोजन होते है। और अपार आस्था के साथ गणगौर रथो को भी नचाया जाता है। निमाड़ अंचल के सिर्वी बहुमूल्य ग्रामों में समाजजनो द्वारा इस पर्व पर भवनो की लीपाई-पोताई व शुद्वीकरण किया जाता है। गणगौर माता में विराजीत ज्वारों (जो मॉ का रूप है) इनकी नवविवाहित जोड़े पूजा अर्चना करते है तथा युवतिया अपना सुहाग अमर रहने की प्रार्थना माताजी से करती है।
गणगौर सिर्वी समाज का सबसे बड़ा पर्व क्यों
बरसो पूर्व से रोजगार तलाश में अपनी जीवन याचिका चलाने राजस्थान से मध्यप्रदेश के निमाड़ व मालवा अंचल में आकर बसे सिर्वी समाज ने अपनी आरध्य देवी श्री आई-माताजी की कृपा से इस क्षेत्र में खूब मेहनत करना प्रारंभ की तत्कालीन समय सिर्फ खेती पर ही आश्रित सिर्वी समाज वर्षा व रबी की फसल पर मूलतः आधारित था। और रबी की फसल को तब और अब भी सीजन कहॉ जाता है याने किसान के पास कुछ आवक का आना इस दौर में सुकड़ती ठंड जाने को होती और हल्की-हल्की गर्मी का आगमन फागुनी रंग-बिरंगी रंगो की होली के बाद चेत्र नवरात्री का उद्गम होता है और शुरू होता है गणगौर का पर्व सिर्वी समाज के पूर्वज बनीये के पुराने रूपये जमा करते थे और अपने व अपने परिवारो के नये वस्त्र खरीद कर सिलवाकर उन्हे पहनकर गणगौर लोक पर्व को अपार उमंग व श्रद्धा से मनाते वह परंपरा आज भी जारी है।
भारतीय संस्कृति के अनुरूप प्राचीन सामाजिक परंपराओ अनुसार सामजजनो द्वारा गणगौर उत्सव के तीनो दिन (रात रूकवाने पर ) चार या पॉचो दिन गॉव की बहु-बेटीयॉ गणगौर रथो को सिर पर लिये गॉव से दूर पानी पिलाने व भोजन कराने ले जाती है इसी तरह आगे पुरूषो की टोली नये परिवेश में पारंपरिक सामाजिक परिवेश पहने सिर पर साफा व मुंह में पान दबाये आगे-आगे अगवानी करती है। जल व भोजन पश्चात पुनः रथो को गॉव की और आई माता मंदिर लाया जाता है। रास्ते भर में ढ़ोल की थाप पर समाज के युवा महिलाये बुजुर्ग व बच्चे सामाजिक लोक नृत्य की प्रस्तुति देते है। वर्ष भर में गणगौर पर्व पर सीरवी महिलाओ को भी पान खाते देखा जाता है। ये सिलसिला प्रतिदिन चलना है, अंतिम दिन माताजी की बिदाई गुड़ तोड़ने के बाद की जाती हैै। पंरपरागत विदाई में गणगौर रथों को नदी किनारे नाचते-गाते ले जाया जाता है। रथों में विराजीत ज्वारों (बाड़ी) बाहर निकाल कर पूजा अर्चना कर उन्हे नर्मदा में विसर्जन किया जाता है।
गुड़ तोड़ का होता है आयोजन
गुड़ तोड आयोजन के बारे में कहावत है। सौ दिन सोनार के एक दिन लौहार याने वर्ष भर पति की सुननेवाली पत्नियों को इस दिन हाथ में लकड़ीया दी जाती है। और करीब 21 फीट लम्बे खम्बे को मक्खन व घी की मालीस कर चीकना कर चोक में खड़ा किया जाता है। और उस पर लाल कपड़े में गुड़ सवारूपया बॉध दिया जाता है। समाज के पुरूषो की टोली में एक के बाद एक उस पोटली को तोड़ने के लिए महिलाओ की टोली में घुस कर चिकने खम्बे पर चढ़कर गुड़ तोड़ कर लाते है इधर खम्बे के आसपास खड़ी समाज की महिलाये इन पुरूषो की टोली को हरी-हरी लकड़ीयो से जमकर पिटाई करती है। और गुड़ तोड़ने से रोकने का काम करती है फिर भी महिलाओं की मार से बचते हुए पुरूषो की टोली गुड़ तोड़ कर लाती है। इस आयोजन को निहारने गॉव व आसपास के अंचल के हजारों लोग उपस्थित होते है। समाज मे इस आयोजन पर अपार उत्साह रहता है। गणगौर पर्व पर निमाड़ अंचल में जहॉ-जहॉ सिर्वी समाज निवास करता है वहॉ-वहॉ आयोजित होते है।
(uploaded by Mangal Senacha,Bangalore, on 13 April 2010 at 7.11 PM )