सीरवी समाज - मुख्य समाचार

Posted By : डॉ भंवर सीरवी, एम.डी (आयुर्वेद.)


डॉ भंवर सीरवी, एम.डी (आयुर्वेद.)
मेडिकल आफिसर, एन. डी. एम. सी. आयुर्वेदिक डिसपेन्सरी,नेताजी नगर ,नई दिल्ली.110023
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पंचभूतात्मक देह में पाँचभौतिक ही आहार का ग्रहण उचित है, क्योंकि शीर्णनात्मक शरीर में जिस जिस पंचभूतात्मक तत्त्व का क्षपण होता है उस उस तत्त्व के ही ग्रहण से उस तत्त्व की शरीर में पूर्ति होती है। सचमुच शरीर में इन तत्त्वों का क्षपण दिनचर्या के अनुरूप होता है, अत एव निस्सन्देह मनुष्य जैसी दिनचर्या का अनुकरण करता है तदनुसार ही क्षपण होता है। इस कारण से इस प्रकार के क्षपण का उत्तरदायित्व सब प्रकार से अनुपालन करने वाले पर ही होता है।
इसके अतिरिक्त भी शरीर का क्षपण होता है, उस क्षपण के उत्तरदायित्व में सोम, सूर्य एवं अनिल का नाम सबसे पहले आता है क्योंकि ये सूर्य, वायु और सोम कालस्वभाव के मार्ग से परिगृहीत काल, ऋतु, रस, दोष, देहबल की निर्वृत्ति (प्रवृत्ति, उत्पत्ति) के कारणभूत कहे जाते हैं। निस्सन्देह इससे संवत्सर ऋतु के विभाग से 6 अंगो वाला होता है और ये 6 ऋतु प्रभाव के परिणाम के रूप का दो तरह से संधारण करती हैं जैसा कि - आदानकाल आग्नेय होता है और विसर्गकाल सौम्य स्वरूपात्मक होता है। इसीलिये आदान एवं विसर्ग को देखकर ही दिनचर्या में परिवर्तन अपेक्षित होता है और यह अपेक्षा ऋतुचर्या के स्वरूप में ज्ञात होती है।
सामान्यतः अप्रेल मास के उत्तरार्ध से लेकर जून मास के उत्तरार्ध तक उत्तर भारत में निस्सन्देह भयावह ग्रीष्म का अनुभव होता है। निस्सन्देह इस समय में ग्रीष्म ऋतु में सूर्य अपनी किरणों से संसार के द्रव्यों तथा प्राणियों के जलीय सार भाग का अत्यधिक पान (शोषण) करता रहता है अतः इस ऋतु में स्वादु, शीतलद्रव्य (ठण्डे तरल पदार्थ, शीतवीर्य द्रव्य) और स्निग्ध अन्नपान पथ्य होता है।
सचमुच इस समय को देखकर लोग स्वादु, लघु, शीत, द्रवस्वरूप द्रव्यों का उपयोग करते हैं। इस क्रम में प्राकृत द्रव द्रव्यों का और कृत्रिम सुनिर्मित द्रवस्वरूप पेयस्वरूप द्रव्यों का उपयोग किया जाता है। निश्चित ही इससे आदान से सन्तप्त अतिप्रतान्त (क्षीणद्रवधातु वाले) क्षीणद्रवात्मक शरीर में सन्तर्पण का अनुभव होता है।
ग्रीष्म में तृप्तिकारक द्रवपूरक द्रव्यों में प्रकृतिप्रदत्त नारियल के जल का नाम पहले आता है। क्योंकि यह तरल रूप, शीतल, स्वादु और प्यास को जीतने वाला होता है जैसा कि भावप्रकाश में कहा गया है -
तस्याम्भः शीतलं हृद्यं दीपनं शुक्रलं लघु।
पिपासापित्तजित्स्वादु बस्तिशुद्धिकरं परम्।।
विशेषतः कोमलनारिकेलं निहन्ति पित्तज्वरपित्तदोषान्।
तदेव जीर्णं गुरु पित्तकारि विदाहि विष्टम्भि मतं भिषग्भिः।। (भावप्रकाशनिघण्टुः)
नारियल का जल शीतल, हृदय के लिए हितकर, शरीर की अग्नि को बढाने वाला, शुक्र को बढाने वाला, पचने में हल्का, प्यास और पित्त को जीतने वाला, स्वादिष्ट (मधुर जायकेदार) और बस्ति (मूत्राशय) को शुद्ध करने वाला होता है।
पका हुआ नारियल सुदुर्जर (कठिनाई से पचने वाला) एवं उष्णवीर्य होता है अतः एव उसका प्रयोग शीतऋतु (हेमन्त तथा शिशिर) में विशेषरूप से किया जाता है किन्तु आर्द्र (जलसहित) कोमल नारियल का प्रयोग ग्रीष्म ऋतु में प्रशस्त होता है क्योंकि कोमल नारियल शीतवीर्य और आसानी से पचने वाला होता है, कोमल एवं जीर्ण नारियल (पक्व नारियल) के लक्षणों का वर्णन करते हुए आचार्य कहते हैं - विशेषतः कोमल नारियल पित्तज्वर एवं पित्तजन्य दोषों को हरता है। चिकित्सकों द्वारा वही जीर्ण (पक्व) नारियल, गुरु, पित्तकारक, विदाहि एवं विष्टम्भि माना गया है।
नारियल की ताजी 100 ग्राम गरी में आर्द्रता 36॰3 ग्राम, प्रोटीन 4॰5 ग्राम, तैल 41॰6 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 13 ग्राम, रेषा 3॰6 ग्राम, चूना ॰01 ग्राम तथा फास्फोरस ॰24 ग्राम तथा अल्प मात्रा में लोह, विटामिन बी, सी, ए तथा ई पाया जाता है। हरे नारियल के प्रति 100 ग्राम जल में सोडियम् 105, पोटेषियम 312, कैल्षियम् 29, मैग्नेष्यिम 30, लोह 0॰10 ताम्र 0॰04, फास्फोरस 37, गंधक 24, क्लोरिन 183, विटामिन सी 2॰7 मिलीग्राम तक तथा अत्यल्प मात्रा में विटामिन बी उपस्थित रहता है।
सामान्यतया प्रयुज्यमान नारियल की 3 अवस्थायें होती हैं - सुकोमल, कोमल (आर्द्र अर्धपक्व) एवं पक्व। सुकोमल (अपक्व) नारियल की ‘डाभ’ नाम से प्रसिद्धि है और वह केवल जलपूर्ण ही होता है और वहीं ग्रीष्म में अत्युपयोगी, तृप्तिकारक, दाहनाशक, तृषापहारक, पित्तनिर्वापक और आसानी से पचने वाला होता है, इसलिये ग्रीष्म ऋतु में शीतल नारियल का जल सर्व प्रकार से प्रयोग योग्य, उपयोगी प्रकृतिप्रदत्त श्रेष्ठ द्रव्य हैं इसका प्रयोग ग्रीष्म में सुखद और बस्तिशोधक होता है।
इसके अतिरिक्त कोमल अर्धपक्व जलसहित आर्द्र नारियल का प्रयोग भी ग्रीष्म ऋतु में सुखप्रद है। तृतीया अवस्था को प्राप्त जीर्ण सुपक्व अतएव संशुष्क ‘गोला-गिरी’ इस नाम से सुविख्यात नारियल का प्रयोग सामान्यतः ग्रीष्म में अल्प मात्रा में ही करना चाहिये अथवा सर्वथा त्याज्य है।
भयानक गर्मी के आते ही निश्चित रूप से संतप्त दिन में अपक्व ‘डाभ’ नामक तथा अर्धपक्व (आर्द्र नारियल) का प्रयोग सुखद होता है। नारियल गुरु, स्निग्ध, पित्तनाशक, स्वादु (मधुर), शीतवीर्य, बल और मांस को बढ़ाने वाला, हृदय के लिये हितकर, बृंहणकारक और बस्तिशोधक होता है।
(uploaded by Mangal Senacha,Bangalore, on 14 March2010 at 4.24PM )