सीरवी समाज - मुख्य समाचार

गणेश चतुर्थी विशेष.....
Posted By : Govind singh Panwar 23 Aug 2020, 04:41:49

गणेश चतुर्थी विशेष.......

बिलाड़ा के धार्मिक एवं पौराणिक स्थल....

\\\\\\\'बालियावास\\\\\\\' के गजानन मन्दिर का इतिहास...

लेखन व संपादन : श्री मोहनलाल राठौड़ \\\\\\\'उचियार्ड़ा\\\\\\\'
(साहित्यकार व संपादक श्री आईजी केसर ज्योति पत्रिका)
संकलन व प्रस्तुति : पुरुषोत्तम चौहान \\\\\\\'बिलाड़ा\\\\\\\'

बिलाड़ा शहर के दक्षिण की तरफ ही नगर से सटा हुआ \\\\\\\'बालियावास\\\\\\\' नामक एक बेरा है। जिसे आज से करीब 350 वर्ष पूर्व सीरवी बालाजी मुलेवा ने बसाया और अपना कुआं भी खुदवाया था। श्री बालाजी मुलेवा के नाम पर ही इस अरट को \\\\\\\'बालियावास\\\\\\\' कहा जाता है। यहां स्थित गणेश जी की प्रतिमा की कई चमत्कारी बातें आज भी श्रद्धालु भक्तों में विशेष रूप से प्रचलित है।
भारतवर्ष एक धर्म प्रधान देश है। यहां की संस्कृति की दृढ़ बुनियाद आध्यात्मवाद है। यहां त्याग-तपस्या, सत्कर्म, भक्ति-भजन को ही सच्चा सुख मानकर मोक्ष प्राप्ति ही मानव जीवन का परम ध्येय मानते है। यहां द्वैत-अद्वैतवाद, एकेश्वर व बहुदेववाद भले ही निर्गुण एवं एकेश्वरवाद पर बल देते हो, लेकिन जनमानस का झुकाव मूर्ति-पूजा एवं बहुदेववाद की तरफ ही ज्यादा है। भारतीय जनमानस में बहुदेववाद ऐसे रमा हुआ है कि जिनके विरुद्ध कई महापुरुषों द्वारा जिहाद छेड़कर एवं आंदोलन चलाकर प्रतिवाद करने पर भी अपने यथास्थान पर कायम है।
हमारी हिन्दू-संस्कृति में तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की पूजा-अर्चना की मान्यता है। इस वसुधरा पर समय-समय पर कई महापुरुष और शक्तियाँ अवतरित हुई, जिन्होंने अपनी वाणी एवं कर्म से जनमानस में ऐसी साख पैदा की, जिसके कारण ये शक्तियां और महापुरुष सदियों बाद भी देवी-देवताओं के रूप में पूजी जाती हैं। उनके चमत्कारों का आज भी ऐसा प्रत्यक्ष प्रभाव है, जिनके प्रति लोगों की श्रद्धा-भक्ति एवं आस्था अनायास ही उनकी तरफ झुक जाती है। उनके चमत्कारी व्यक्तित्व के कारण उनकी भक्ति में लोग इतनी गहराई तक डूब जाते हैं कि ये शक्तियां उनके लिए आराध्यदेव एवं मोक्ष प्राप्ति का साधन बन जाते हैं।
व्यक्ति के जीवन में कई बार ऐसी घटनाएं घटती है, जिससे वह आस्तिक से नास्तिक और नास्तिक से आस्तिक बन जाता है। बालक मूलशंकर (स्वामी दयानन्द) ने शिवरात्रि को शिव लिंग पर चढ़े प्रसाद को खाते हुए एक चूहे को क्या देख लिया, वे आस्तिक से नास्तिक और मूर्ति-पूजा विरोधी हो गए। गोस्वामी तुलसीदास की पत्नी रत्नावली के मुंह से निकले शब्द बाण मोह माया में फंसे उसके पति को ऐसे लगे कि वे महाकवि और राम भक्त बन गए। गौतम बुद्ध ने वृद्ध, बीमारी और शव यात्रा का दृश्य क्या देख लिया, उन्हें भगवान बुद्ध बनाकर कैवल्य ज्ञान की उपलब्धि दे गया। हमारा इतिहास ऐसी अनेक विस्मयकारी घटनाओं से भरा पड़ा है।
भारत भूमि का चप्पा-चप्पा किसी न किसी घटना, चमत्कार, ईश्वरीय शक्तियों के अवतार व महापुरुषों के कर्म कर्तव्यों की सुगन्ध से महक रहा है। हर स्थान से कोई न कोई घटना अवश्य ही जुड़ी हुई है। इसी कारण कण-कण में भगवान बसा है, की मान्यता भारत में प्रचलित है।
शिव-पार्वती नन्दन \\\\\\\'गणेश\\\\\\\' (गणों का स्वामी) शिव परिवार में बुद्धि के अधिदेवता और मंगलकारी माने जाते हैं। विघ्नों को दूर करने के लिए \\\\\\\'श्री गणेश\\\\\\\' की पूजा सर्व मांगलिक कार्यों के आरम्भ में की जाती है। \\\\\\\'सब देवताओं में से सबसे पहले किसे पूजा जाय ?\\\\\\\' देवताओं में छिड़े इस विवाद पर गजानन ने अपने माता-पिता (शिव-पार्वती) को ही सृष्टि का प्रतीक रूप मानते हुए अपने वाहन मूषक (चूहे) पर आरूढ़ होकर अपने माता-पिता की परिक्रमा कर \\\\\\\'प्रथम वन्दनीय देवता\\\\\\\' (प्रथम वन्दे गणपति) का स्थान प्राप्त किया था। तभी से आज तक मानव जाति अपने हर शुभ कार्य का आरम्भ \\\\\\\'गणपति पूजन\\\\\\\' से करते है। वैसे तो भगवान गणेश (गजानन) के जीवन से जुड़ी अनेक कथाएं, अनुश्रुतियां और चमत्कारी घटनाएं है, जो उन्हें सदा से ही श्रेष्ठता का पद प्रदान किए हुए हैं।
ईश्वर सृष्टि का कर्ता, भर्ता और हर्ता है। वह अदृश्य रहकर इस सृष्टि का संचालन कर रहा है। उसकी शक्ति के बिना यहां कोई कुछ नहीं कर सकता। कहा भी गया है-
\\\\\\\'तेरी सता के बिना, हे प्रभु मंगल मूल।
पत्ता तक हिलता नहीं, खिलता कहीं न फूल।।
देव-गणपति के चमत्कारों से इस भू लोक के कई भाग आज भी वन्दनीय और जनमानस की आस्था, भक्ति और श्रद्धा केन्द्र बने हुए है। ऐसा ही एक स्थान बिलाड़ा नगर में भी विद्यमान है। जो \\\\\\\'गणेश प्रतिमा\\\\\\\' के चमत्कार के कारण आज भी विख्यात है।
बिलाड़ा शहर के दक्षिण की ओर शहर से सटा हुआ \\\\\\\'बालियावास\\\\\\\' नामक एक अरट (कुआं-बेरा) जहां पर स्थित गजानन की प्रतिमा कई विशेषताओं को लिए हुए हैं। यहां के मन्दिर में स्थित \\\\\\\'गजानन\\\\\\\' की प्रतिमा से जुड़ी हुई कई चमत्कारी बातें भी श्रद्धालु, जनमानस में विशेष रूप से प्रचलित हैं।
जनश्रुति के अनुसार ऐसी बात प्रसिद्ध है कि आज से करीब 350 वर्ष पूर्व बिलाड़ा नगर के सीरवी बालाजी मुलेवा ने अपने नाम पर यह अरट बसाया और कुआं खुदवाया था। उन्हीं के नाम पर ही इस अरट को \\\\\\\'बालियावास\\\\\\\' कहते हैं। यहां के गणेशजी की प्रतिमा (मूर्ति) पहले \\\\\\\'लखूड़ी मगरी\\\\\\\' नामक स्थान पर एक कैर के वृक्ष के नीचे विराजमान थी। पहले बिलाड़ा एक गांव रूप में ही था। आज जहां पर विभिन्न कुएं है, वह पहले बीहड़ और निर्जन क्षेत्र ही था। वैसे बिलाड़ा क्षेत्र की भूमि मैदानी और पठारी दोनों रूपों में है। कहीं-कहीं पर छोटी-मोटी पहाड़ियां आज भी दिखाई देती हैं। बिलाड़ा के परिश्रमी किसानों ने यद्यपि बहुत से मगरों को जमीन रूप में बदल दिया है, लेकिन प्रकृति की अद्भुत देन ये पहाड़-पहाड़ियां अपना समूल वर्चस्व कभी नहीं खोते हैं।
एक बार पाली की ओर से कुछ अज्ञात चोर बिलाड़ा की तरफ आएं और अनेक स्थानों पर चोरियां करने के बाद जाते समय बालाजी मुलेवा के अरट (बालियावास) पर से बैल चुराकर ले गएं। सुबह तड़के बालाजी मुलेवा को यह बात ज्ञात हुई, तो वे अपने बैलों को ढूंढते खोजते बिलाड़ा के पूर्व की ओर स्थित \\\\\\\' \\\\\\\'लखूड़ी मगरी\\\\\\\' नामक स्थान पर गए।
बालाजी मुलेवा को यह विश्वास था कि हो सकता है बैल रात को खूंटे से स्वयं ही छूटकर चले गए हों या फिर कोई चोर उन्हें चुराकर इसी दिशा में ले गया होगा। \\\\\\\'लखूड़ी मगरी\\\\\\\' पर एक बड़े कैर के वृक्ष के नीचे गजानन (गणेशजी) की विशाल प्रतिमा प्रतिष्ठित थी और वहां छोटा सा थान (मंदिर) भी बना हुआ था।
बालाजी मुलेवा अपने बैलों को ढूंढते हुए मगरी पर इधर उधर देखते फिरते रहे। थके हारे बालाजी मुलेवा एक वृक्ष की घनी छाया में बैठकर सोचने लगे कि अब बैलों को कहाँ ढूंढा जाय ? किधर जाऊं और किसे पूंछू ? कुछ समझ में नहीं आ रहा है क्या किया जाय ? बालाजी मुलेवा इसी सोच-विचार में डूबे हुए विश्राम कर रहे थे कि अचानक उन्हें पास ही कैर के वृक्ष के नीचे स्थित गजानन की प्रतिमा में से आवाज सुनाई दी कि, बाला! तू चिन्ता छोड़कर वापस अपने अरट (बेरे) पर चला जा। सातवें दिन तेरे बैल खूंटे पर आकर खड़े मिलेंगे। कहते हैं गजानन प्रतिमा से यह आश्वासन वाणी सुनकर बालाजी मुलेवा अपने अरट पर वापस लौट आए और सन्देह विश्वास की उधेड़बुन में सात दिन बीतने की आशा करने लगे। \\\\\\\'गजानन-प्रतिमा\\\\\\\' से निकली वाणी बालाजी मुलेवा के लिए ईश्वरीय शक्ति में आस्था रखने का एक निमन्त्रण स्वरूप आदेश ही था। सच भी है-
पंख खुल जाते स्वयं ही, शून्य का पाकर निमन्त्रण।
विस्मरण होता सहज ही, ईश आस्था आवास उस क्षण।।
दिन पे दिन गुजरते रहे, लेकिन बालाजी मुलेवा के मस्तिष्क में संशय और विश्वास की उठती तरंगें आपस में टकरा रही थीं। वे कभी मन को आश्वस्त करते कि \\\\\\\'देव प्रतिमा\\\\\\\' से निकली वाणी झूठी नहीं हो सकती, परन्तु वन के पक्षी की तरह अपनी पल-पल बदलती उड़ानों का आदी मानव मन कभी इस सत्यता पर प्रश्न चिह्न भी लगा देता था। छठे दिन की तारों सजी रजनी बालाजी मुलेवा के लिए शुभ संकेत पथ की तरह बीती। सातवें दिन बालाजी मुलेवा के बैल खूंटे के पास खड़े मिले। बालाजी मुलेवा का मन प्रसन्नता, ईश्वरीय और श्रद्धा भक्ति के त्रिवेणी संगम में नहा रहा था। उनका रोम-रोम \\\\\\\'गजाननजी\\\\\\\' को अपने भक्ति व आस्था के महकते पुष्प अर्पित कर कृतार्थ हो रहा था।
कहते हैं- \\\\\\\'चमत्कार को सदा नमस्कार।\\\\\\\' वैसे चमत्कार मूर्ति एवं पत्थर में नहीं, बल्कि भक्ति, साधना, तपस्या, पूजा, अर्चना, आराधना, श्रद्धा एवं आस्था में है। लेकिन आज दुनिया में स्वार्थ और ढोंग का ऐसा आवरण छाया हुआ है, जिनके पीछे सच्ची चमत्कारिक शक्तियां एवं सच्ची भक्ति भावना छिप चुकी है। आज लोग भक्ति से पहले ही वरदान प्राप्त करना चाहते है। लेकिन यहाः बालाजी मुलेवा की निर्मल श्रद्धा ने इस चमत्कार को सदा के लिए वन्दनीय बना दिया । कहते भी है-
\\\\\\\'मानव-आस्था सदा ही करती, चमत्कार को नमस्कार।
चमत्कार से बन जाता है, पत्थर भी भगवान अवतार।।
\\\\\\\'गजानन जी\\\\\\\' के वचन से अपने बैलों को पाने के बाद बालाजी मुलेवा ने सुनसान स्थान \\\\\\\'लखूड़ी-मगरी\\\\\\\' पर से श्री गजाननजी की विशाल प्रतिमा को अपनी बैलगाड़ी पर बिठाकर अपने अरट \\\\\\\'बालियावास\\\\\\\' पर लाकर कुएं के समीप चबूतरा बनाकर प्रतिष्ठित किया तथा सुबह शाम \\\\\\\'गजाननजी\\\\\\\' की पूजा अर्चना, स्तुति-वन्दना करने लगे और उनके नाम की माला जपने लगे।
कहते है - \\\\\\\'बालियावास\\\\\\\' में प्रतिष्ठित होने के बाद \\\\\\\'गजानन प्रतिमा\\\\\\\' ने शीघ्र ही अपना दूसरा चमत्कार भी दिखाया। बालाजी मुलेवा पर उस समय सेठ साहूकारों का कर्ज (ऋण) बहुत चढ़ा हुआ था। जिसे चुकाने के लिए बालाजी मुलेवा ने बहुत प्रयत्न किया। दिन-रात परिश्रम किया, लेकिन सेठ-साहूकारों का सूद तो दिन-रात बढ़ रहा था। बालाजी मुलेवा ने \\\\\\\'गजाननजी\\\\\\\' की भक्ति व पूजा अर्चना निरन्तर जारी रखी। उनकी ईश-भक्ति से प्रसन्न होकर \\\\\\\'गजाननजी\\\\\\\' ने बालाजी मुलेवा को रात स्वप्न में यह आज्ञा दी कि- बाला! तुम कल रात भर अरट चलाना, कुएं से घड़लियों में पानी के साथ सोने की मोहरे भी आयेंगी, उन मोहरों से तुम साहूकारों का कर्ज चुका देना। बालाजी मुलेवा ने ऐसा ही किया। कुएं से बहुत सी स्वर्ण मुद्राएं (सोने की मोहरें) पानी के साथ बाहर आई। जिनको देकर बालाजी मुलेवा सेठ-साहुकारों के कर्ज से उऋण हुए।
इस घटना से \\\\\\\'गजानन जी\\\\\\\' की बहुत मान्यता बढ़ी और तभी से जन-समुदाय अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के उद्देश्य से इस स्थान पर आकर चूरमा आदि प्रसाद चढ़ाते हैं। गजाननजी द्वारा तुष्टमान और मनोकामना पूर्ण होने की खुशी में बिलाड़ा और आस-पास के बहुत से श्रद्धालु भक्तों ने \\\\\\\'गणेशजी\\\\\\\' की अन्य प्रतिमाएं बनवाकर इस स्थान (बालियावास) पर स्थापित कर अपनी श्रद्धा भक्ति का अपूर्व परिचय दिया है।
बालियावास पर जिस पत्थर की बड़ी कुंडी युक्त गणेश प्रतिमा को लाया गया था, वह कुंडी आज भी मन्दिर के पास टूटे रूप में विराजमान है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार रामनाथ जी महाराज ने जन सहयोग से आज से लगभग 40 वर्ष पहले करवाया था। इस मन्दिर में अपनी मन्नतें मांगने वाले बहुत से भक्तों की मनोकामनाएं सफल भी हुई हैं।
इस प्रकार \\\\\\\'बालियावास\\\\\\\' का यह गजानन-मन्दिर आज भी लोगों की श्रद्धा और भक्ति का केन्द्र बना हुआ है।

~ भारत का आध्यात्म चिंतन \\\\\\\'आई पंथ\\\\\\\' पुस्तक से साभार...21.08.2020

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