सीरवी समाज - मुख्य समाचार

सीरवी एक जाति है जो आज से लगभग 800 वर्ष पुर्व अलग होकर राजस्थान के मारवाड़ और गौडवाड़ क्षेत्र में रह रही थी।
Posted By : Manohar Seervi on 07 Sep 2018, 14:26:49
सीरवी एक जाति है जो आज से लगभग 800 वर्ष पुर्व अलग होकर राजस्थान के मारवाड़ और गौडवाड़ क्षेत्र में रह रही थी। कालान्तर में यह जाति मेवाड़, मालवा, निम्हाड़ व देश के अन्य क्षेत्र में फैल गए। वर्तमान में सीरवी समाज के लोग राजस्थान के अलावा मध्यप्रदेश,उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, दमन दीव, पुडुचेरी आदि क्षेत्रों में बड़ी संख्या में रह रहे हैं।
सीरवी समाज के इतिहास का बहुत कम प्रमाण उपलब्ध है। इतिहास के जानकार मास्टर श्री शिवसिंहजी चोयल भावी ने अपने शोधों में इससे संबंधित कुछ तथ्य जुटाए हैं। उनके अनुसार जो खारड़िया राजपूतों का शासन जालोर पर था व राजा कान्हड़देव चौहान वंशीय थे उन्ही के वंश 24 गौत्रीय खारड़िया सीरवी कहलाये। मान्यता है कि सीरवी जाति का उद्गम भी वैदिक क्षत्रिय राजपूत जाति से ही हुआ है। इस जाति की जो 24 गौत्र (खापें) हैं वह क्षत्रिय राजपूतों से मिलती है। १० वीं सदी के आस-पास गुजरात प्रान्त में जूनागढ़ एवं राजकोट के बीच एक राज्य सम्भवतः गिरनार के राजा का अपने पड़ौस के किसी राजा से एक बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। इसमें हजारों सैनिक रण क्षेत्र में खेत रहे एवं अपार जान माल की क्षति हुई। जो क्षत्रिय बच गए थे, उन्होंने गुजरात को ही त्याग दिया एवं राजपूताना प्रान्त की ओर चल पड़े और जालोर राज्य, जो गुजरात की सीमा पर ही था, में आकर बस गये। उस समय जालोर पर चौहान वंषीय राजा कान्हड़देव सोनगरा का शासन था। ये 24 गोत्रिय राजपूत गुजरात प्रान्त के खारी-खाबड़ क्षेत्र से आये थे। अतः वे खारड़िया राजपूत कहलाये। इन्होंने कृषि को ही अपना मुख्य व्यवसाय बनाया था। इस कारण राजा कान्हड़देव ने इन लोगों को खेती व्यवसाय हेतु अपने राज्य में बसने की अनुमति प्रदान की और उनसे पैदावार का 9वां हिस्सा राजकोश में देने का ताम्बा-पत्र स्थायी लिखित आदेष जारी किया। इन 24 खापों के राजपूत ने जालौर के आस-पास 24 खेड़ो (गांवो) को बसाया। जो निम्न है-1.कूदणी खेड़ा 2. गोखर खेड़ा 3. बीठू खेड़ा 5. पादरला खेड़ा 6.कुरजडिया़ खेड़ा 7. थूंबड़िया खेड़ा 8. उसदड़ा खेड़ा 10. आकोर खेड़ा 11.नरवर खेड़ा 12. जेतपुरा खेड़ा 13.मण्डला खेड़ा 14. वीठला खेड़ा 15. जोगणी खेड़ा 16.लांबिया खेड़ा 17. हिंगोला खेड़ा 18.केरला खेड़ा 19. मानपुरा खेड़ा 20. नगवाली खेड़ा 21.लेटोंरा खेड़ा 22. बागोदरा खेड़ा 23. मूलोरा खेड़ा 24. :कुछ इतिहासकारों का इनसे भिन्न मत है। मुंषी देवी प्रसाद कृत मारवाड़ मर्दुमषुमारी रिपोर्ट सन् 1891 के अनुसार खारड़िया राजपूत जालोर के निवासी ही थे। खारी क्षेत्र में निवास करने के कारण ही इन्हें खारड़िया राजपूत कहा जाता था। इन्हीं खारड़िया राजपूतों का शासन जालोर पर था। राजा कान्हड़देव, जो चौहान वंषीय था, इन्ही में से था। ये 24जब विक्रम सम्वत् 1368 में अलाउद्दीन खिलजी ने जालोर पर आक्रमण किया तब खारड़िया राजपूत कान्हाड़देव बड़ी बहादूरी से लड़े। परन्तु बादशाह की सेना संख्या में कई गुना अधिक थी एवं अच्छे हथियारों से सुसज्जित थी, जबकि राजपूतों की संख्या कम एवं साधन सीमित थे। फिर भी उन्होंने काफी दिन तक बादशाह की सेना का बडी वीरता से सामना किया। लम्बे समय तक युद्ध चलते रहने के कारण जालोर के किले में रसद सामग्री खत्म होने लगी। बाहर से रसद सामग्री आने के सभी रास्ते बन्द थे। अतः वैशाख सुद 5 विक्रम संवत 1368 को खारड़िया राजपूतों ने साका किया। जो इतिहास में जालोर के साका के नाम से प्रसिद्ध है। राजपूत लोग लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए और जालोर के किले पर खिलजी का अधिकार हो गया। उन्होंने हिन्दू प्रजा से उपज के नौंवे भाग की बजाय जजिया के रूप में फसल का आधा हिस्सा वसूलना शुरू किया। अतः इससे दुखी होकर बचे हुए खारड़िया राजपूतों ने 600 बैलगाड़ियों में अपना सामान लादकर पाली व जोधपुर जिले की तरफ प्रस्थान किया और लूनी नदी के आस-पास के क्षेत्र में जहाँ सिंचाई के पानी की पर्याप्त सुविधा थी, वहाँ बस गये। ये। लोग यहाँ पर पूर्व में बसे जणवों के साथ सीर साझे में खेती करने के कारण सीरवी कहलाये। खारड़िया राजपूतों ने तलवार का मोह त्याग कर वर्षों से बंजर पड़ी भूमि को अपने हाथों से हल चलाकर उपजाऊ बनाया। फिर यही खेती इनका मुख्य व्यवसाय बन गया। जिस-जिस क्षेत्र में उपजाऊ जमीन व सिंचाईं की सुविधा उपलब्ध थी। वहां-वहां ये लोग बढ़ते एवं बसते गये। अपने परिश्रम लगन एवं ईमानदारी से इस व्यवसाय के प्रति समर्पित हो जाने के कारण किसान जाति के रूप में इनकी ख्याति हुई।

सीरवियों के गोत्र इस प्रकार हैं-
राठौड़, सोलंकी, गहलोत, पंवार, काग, बर्फा, देवड़ा, चोयल, भायल, सैणचा, आगलेचा, पड़ियार, हाम्बड़, सिन्दड़ा, चौहान, खण्डाला, सातपुरा. मोगरेचा, पड़ियारिया, लचेटा, भूंभाड़िया, चावड़िया, मुलेवा, सेपटा

धार्मिक विश्वास

अधिकतर सीरवी आईमाता, जिनका मंदिर राजस्थान के बिलाड़ा कस्बा में हैं, के अनुयायी हैं। विक्रम संवत 1472 में गुजरात प्रदेष में अम्बापुर में बीकाजी डाबी के यहां अवतार धारण करने वाली जीजी अपने आई-पंथ का प्रचार करती हुई गोडवाड़ एवं मारवाड़ क्षेत्रों में आई। सीरवी जाति के अधिकांश लोग उनके अनुयायी बन गये। श्री आईजी ने उन्हें डोरा बंध बनाकर अपने आई-पंथ में दीक्षा दी। सीरवी समाज वालों ने श्री आईजी को अपनी ईष्ट देवी मान लिया। जब देवी वि.स. 1521 में बिलाड़ा पधारी एवं सीरवी जाणौजी राठौड़ के पौत्र एवं माधवदास के पुत्र गोयन्ददास को अपनी गादी का प्रथम दीवान नियुक्त कर अखण्ड-ज्योति की स्थापना की, उसी परम्परा का सीरवी लोग आज भी पालन कर रहे है और नित्य प्रति अखण्ड-ज्योति की पूजा करते हैं। इतना ही नहीं आई-पंथ का प्रचार करने के लिए उन्होंने धर्मरथ बनवाकर उसमें स्वयं विराजमान होकर गांव-गांव भ्रमण किया एवं जन-साधारण का अपनें सदुपदेशों सें उद्धार किया।